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वाराणसी में एक अदालत जहां लगता था क्रांतिकारियों का मेला, अधिवक्ताओं ने जलाए दीप

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वाराणसी में एक अदालत जहां लगता था क्रांतिकारियों का मेला, अधिवक्ताओं ने जलाए दीप


— गूंजे ‘भारत माता की जय’ के नारे,धानापुर कांड के 71 क्रांतिकारियों की याद में अधिवक्ताओं ने किया श्रद्धांजलि कार्यक्रम

वाराणसी, 13 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के बनारस कचहरी के ऐतिहासिक लाल भवन में गुरुवार शाम स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानियों की स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। भवन के प्रथम तल पर दक्षिण दिशा में स्थित उस अदालत कक्ष के सामने अधिवक्ताओं ने दीप जलाकर धानापुर कांड के क्रांतिकारियों को नमन किया, जहां आजादी से पहले 71 स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ मुकदमे चले थे।

इस दौरान अधिवक्ताओं ने हाथों में तिरंगा लेकर ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ और ‘धानापुर के स्वतंत्रता सेनानी अमर रहें’ के नारे लगाए। अदालत कक्ष के सामने लगे शिलालेख के पास चंद्रशेखर आजाद, छत्रपति शिवाजी महाराज और रानी लक्ष्मीबाई सहित अन्य महान स्वतंत्रता सेनानियों के चित्र सजाकर दीप प्रज्ज्वलित किए गए।

कार्यक्रम का नेतृत्व बनारस बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री नित्यानंद राय और गौतम झा ने किया। नित्यानंद राय ने बताया कि वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तत्कालीन वाराणसी जिले की चंदौली तहसील के धानापुर में क्रांतिकारियों ने थाने पर तिरंगा फहराने का निर्णय लिया था। 16 अगस्त को तिरंगा फहराने के दौरान ब्रिटिश सरकार की पुलिस ने गोलीबारी कर दी, जिसमें तीन आंदोलनकारी शहीद हो गए। इसके बाद क्रांतिकारियों और पुलिस के बीच हिंसक संघर्ष हुआ, जिसमें थानेदार समेत चार पुलिसकर्मियों की मौत हो गई।

धानापुर की इस घटना को काशी का ‘चौरीचौरा कांड’ भी कहा जाता है। घटना के बाद 71 क्रांतिकारियों के खिलाफ राजद्रोह, हत्या और लूट समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमे चलाए गए। तत्कालीन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नियाज अहमद ने 15 दिसंबर 1944 को फैसला सुनाया। अदालत ने 55 आरोपियों को दोषी करार दिया, जबकि 15 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया।

फैसले में सूर्यमणि सिंह उर्फ मन्नी सिंह, हरनारायण अग्रहरी और देव सागर सिंह को मृत्युदंड सुनाया गया। इसके अलावा 16 आरोपियों को आजीवन कारावास, 28 को दस वर्ष के कठोर कारावास, सात को सात वर्ष और एक आरोपी को पांच वर्ष की सजा दी गई।

हालांकि, देश की आजादी के साथ ही इन सभी दोषसिद्ध क्रांतिकारियों को रिहा कर दिया गया। इस तरह 1947 की आजादी की सुबह ने उन स्वतंत्रता सेनानियों को नया जीवन दिया, जिनके लिए ब्रिटिश अदालत ने फांसी और लंबी कैद की सजा तय की थी।

वाराणसी कचहरी का लाल भवन भी स्वतंत्रता आंदोलन की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। इसी भवन पर 11 अगस्त 1942 को पहली बार तिरंगा फहराया गया था। आजादी से पहले इसका परिसर क्रांतिकारियों की गतिविधियों और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा।

श्रद्धांजलि कार्यक्रम में सेंट्रल बार के पूर्व महामंत्री सुरेंद्र पांडेय, विनय शंकर राय ‘मुन्ना’, विनोद पांडेय ‘भैयाजी’, राजीव सिन्हा, समीर मिश्रा, सुनील सिंह, अमरनाथ पुरी, मंगला प्रसाद सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता मौजूद रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी