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बासमती धान क्रांति के जनक वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार सिंह पद्मश्री से सम्मानित

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वाराणसी, 25 मई (हि.स.)। पूरे देश में बासमती धान उत्पादन और कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले जाने-माने कृषि वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार सिंह को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया है। यह सम्मान उन्हें भारतीय कृषि, विशेषकर बासमती चावल की उन्नत एवं जलवायु-अनुकूल किस्मों के विकास में उनके असाधारण योगदान के लिए प्रदान किया गया है।

डॉ अशोक सिंह को पद्मश्री सम्मान मिलने पर काशी (वाराणसी) के कृषि वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ भी उत्साहित है। 1 जुलाई 1962 को जन्मे डॉ. सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से कृषि में स्नातक तथा आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली से आनुवंशिकी विषय में पीएचडी की उपाधि हासिल की। वर्ष 1994 में कृषि अनुसंधान सेवा में वैज्ञानिक के रूप में शामिल होने के बाद उन्होंने बासमती अनुसंधान को नई दिशा दी और वर्ष 2008 से बासमती प्रजनन कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे हैं।

बताते चले डॉ. सिंह प्रमुख प्रजनक के रूप में 11 बासमती किस्मों सहित 27 धान किस्मों के विकास से जुड़े रहे हैं। उनके नेतृत्व में विकसित जलवायु-अनुकूल, कम अवधि वाली, उच्च उत्पादकता और रोग प्रतिरोधी बासमती किस्मों ने देशभर के किसानों के बीच व्यापक लोकप्रियता हासिल की है। वर्तमान में उनकी विकसित किस्मों का उपयोग भारत के 90 प्रतिशत से अधिक बासमती क्षेत्र, लगभग 20 लाख हेक्टेयर भूमि पर किया जा रहा है, जिससे देश को वर्ष 2024-25 में 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी मुद्रा अर्जन हुआ है। डॉ सिंह ने पूसा बासमती 1509, पूसा बासमती 1692 और पूसा बासमती 1847 जैसी अल्पकालिक किस्मों का विकास कर किसानों को फसल विविधीकरण और अधिक आय अर्जित करने का अवसर प्रदान किया। साथ ही बैक्टीरियल ब्लाइट एवं ब्लास्ट रोग प्रतिरोधी बासमती किस्मों के विकास से खेती की लागत और कीटनाशकों के उपयोग में कमी आई, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बासमती की प्रतिस्पर्धात्मकता और मजबूत हुई।

डॉ. सिंह ने प्रत्यक्ष बुवाई (डाइरेक्ट सीडेड राइस) के लिए उपयुक्त शाकनाशी-रोधी बासमती किस्मों के विकास का भी नेतृत्व किया। इन नवाचारों से सिंचाई जल की खपत में लगभग 30 प्रतिशत कमी, उत्पादन लागत में प्रति एकड़ करीब 5 हजार रुपये की बचत तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी संभव हुई है। डॉ. सिंह अब तक 34 पीएचडी और 5 एमएससी विद्यार्थियों का मार्गदर्शन कर चुके हैं। आईएआरआई के निदेशक के रूप में उनके कार्यकाल में संस्थान ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊंचाइयों को छुआ। उनके नेतृत्व में आईएआरआई को सरदार पटेल उत्कृष्ट संस्थान पुरस्कार प्राप्त हुआ तथा एनआईआरएफ-2024 रैंकिंग में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में देश में शीर्ष स्थान हासिल हुआ। डॉ. सिंह के नाम 200 से अधिक शोध पत्र, 6,300 से अधिक उद्धरण तथा 41 का एच-इंडेक्स दर्ज है। वे इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी , नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज इंडिया तथा नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज सहित देश की प्रमुख वैज्ञानिक अकादमियों के फेलो हैं।

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें पूर्व में रफी अहमद किदवई पुरस्कार, सी. सुब्रमण्यम पुरस्कार, बोरलॉग पुरस्कार, बी.पी. पाल पुरस्कार, ओम प्रकाश भसीन पुरस्कार, वासविक पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी