हर जाति का सम्मान, सामाजिशिक्षा संस्थानों को नफरत और विभाजन की राजनीति से दूर रखे: अजय राय
- बीएचयू में एमए इतिहास की परीक्षा में “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे शब्दों का कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने किया विरोध
वाराणसी,20 मई (हि.स.)। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) जैसे देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में एमए इतिहास की परीक्षा में “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे शब्दों को जिस प्रकार प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया गया है, इसको लेकर विवाद गहराता जा रहा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने बुधवार को इस मामले में तीखी प्रतिक्रिया दी है।
उन्होंने कहा कि हर जाति का सम्मान, सामाजिक समरसता हमारी पहचान है। ऐसे में शिक्षा संस्थानों को नफरत और विभाजन की राजनीति से दूर रखा जाए। शिक्षा का उद्देश्य किसी जाति, वर्ग या समुदाय के प्रति दुर्भावना पैदा करना नहीं, बल्कि समाज को ज्ञान, संवेदनशीलता और एकता की दिशा देना होता है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज शिक्षा संस्थानों में भी ऐसी विचारधाराएं थोपी जा रही हैं जो समाज में वैचारिक टकराव और जातीय विभाजन को बढ़ावा देती हैं।
अजय राय ने कहा कि भारत की सनातन परंपरा में ब्राह्मण समाज सदैव ज्ञान, तप, शिक्षा, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक रहा है। वेदों, उपनिषदों, भारतीय दर्शन, संस्कृत साहित्य और शिक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाने में ब्राह्मण समाज का ऐतिहासिक योगदान रहा है। ब्राह्मण समाज सदैव पूजनीय था, है और रहेगा। किसी भी जाति को अपमानित करने या उसे संदेह के घेरे में खड़ा करने की मानसिकता भारतीय संस्कृति और संविधान दोनों के विरुद्ध है। आज लगातार देखा जा रहा है कि शिक्षण संस्थानों में आरएसएस की वैचारिक दखल बढ़ती जा रही है।
विश्वविद्यालय, कॉलेज और भर्ती परीक्षाओं तक में ऐसे प्रश्न और विषय शामिल किए जा रहे हैं जो समाज के भीतर जातीय तनाव और विरोधाभास पैदा करें। पहले उत्तर प्रदेश की दरोगा भर्ती परीक्षा में ब्राह्मण समाज को “अवसरवादी” बताने वाला प्रश्न पूछा गया, जिस पर भारी विवाद हुआ। उसके बाद “घूसखोर पंडित” नामक फिल्म के जरिए भी एक पूरे वर्ग को अपमानित करने का प्रयास किया गया, जिसका व्यापक विरोध हुआ और अंततः फिल्म निर्माताओं को माफी मांगते हुए शीर्षक वापस लेना पड़ा। अब बीएचयू में इस प्रकार के प्रश्न यह दर्शाते हैं कि शिक्षा व्यवस्था को एक विशेष वैचारिक एजेंडे के तहत प्रभावित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा संस्थानों को लोकतांत्रिक बहस, संविधान, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता का केंद्र होना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रयोगशाला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी संविधान, सामाजिक सौहार्द और हर वर्ग के सम्मान की रक्षा के लिए सदैव संघर्ष करती रहेगी। हम इस प्रश्न और ऐसी मानसिकता का पुरजोर विरोध करते है तथा विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग करते हैं कि इस प्रश्न को तत्काल वापस लिया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में शिक्षा संस्थानों का उपयोग किसी राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे के लिए न हो।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

