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बीएचयू और ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के बीच समझौता हस्ताक्षरित

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बीएचयू और ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के बीच समझौता हस्ताक्षरित


वाराणसी, 26 अक्टूबर (हि.स.)। मानव विकास और उसकी उत्पत्ति के रहस्यों को सुलझाने के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के बीच प्रस्तावित गठजोड़ ने अब औपचारिक और कानूनी रूप ले लिया है। पूर्व में इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना के लिए मिली स्वीकृति के बाद, अब दोनों विश्वविद्यालयों के अधिकृत अधिकारियों ने 'पार्टनर ऑर्गनाइजेशन एग्रीमेंट' पर विधिवत हस्ताक्षर कर दिए हैं। 22 अक्टूबर 2026 को दोनों पक्षों के हस्ताक्षर की प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही यह समझौता आधिकारिक रूप से लागू हो गया है और अब इस महापरियोजना के तहत धरातल पर शोध कार्य शुरू होने का रास्ता साफ हो गया है।

इस अनुबंध पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की ओर से कुलसचिव राजन श्रीवास्तव ने और ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी की ओर से रिसर्च सर्विसेज की डिप्टी डायरेक्टर लिनेट फरकुहर ने ई-हस्ताक्षर कर अनुबंध की प्रक्रिया को पूर्ण किया। यह जानकारी सोमवार को बीएचयू के जनसम्पर्क कार्यालय ने दी।

उक्त जानकारी में बताया कि अनुबंध के लागू होने के बाद अब ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के प्रो. माइकल पेट्राग्लिया के नेतृत्व वाले 'एआरसी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ट्रांसफॉर्मिंग ह्यूमन ओरिजिन्स रिसर्च' में बीएचयू की सक्रिय भागीदारी शुरू होगी। केंद्र में 'पार्टनर इन्वेस्टिगेटर' बनाए गए बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे अब विशेष रूप से 'ग्लोबल साउथ' से जुड़े डेटा के सृजन, उसके विश्लेषण और वैज्ञानिक व्याख्या का कार्य करेंगे। इसके माध्यम से मानव विकास के अध्ययन में अब तक रहे पुराने पूर्वाग्रहों को दूर किया जाएगा और नई शोध पद्धतियां विकसित की जाएंगी।

ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के प्रो. माइकल पेट्राग्लिया के नेतृत्व में संचालित इस केंद्र को ऑस्ट्रेलियन रिसर्च काउंसिल (एआरसी) की ओर से सात वर्षों के लिए 85 मिलियन डॉलर का अनुदान प्राप्त हुआ है। विश्व की शीर्ष दो प्रतिशत यूनिवर्सिटीज में शामिल ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी की यह पहल मानव विकास अध्ययन के क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े शोध कार्यक्रमों में से एक है। इसमें द ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, मोनाश यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड और यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया जैसे कई शीर्ष संस्थान भी शामिल हैं।

इस समझौते के तहत अगला सबसे बड़ा कदम मानव उत्पत्ति अनुसंधान और सामुदायिक उपयोग के लिए एक नैतिक अनुसंधान डेटा रिपॉजिटरी यानी 'सेंटर डेटाबेस' का निर्माण करना होगा। इस डेटाबेस में बीएचयू सहित सभी साझेदार संस्थान किस प्रकार डेटा उपलब्ध कराएंगे और उसका उपयोग कैसे करेंगे, इसके लिए आगे एक अलग 'डेटाबेस एग्रीमेंट' तैयार किया जाएगा। शोध के दौरान एकत्र किए गए स्वदेशी डेटा के प्रबंधन और स्वामित्व का अधिकार संबंधित मूल समुदायों के पास ही सुरक्षित रहेगा। शोध के दौरान विकसित होने वाली किसी भी बौद्धिक संपदा (प्रोजेक्ट आईपी) पर संबंधित प्रोजेक्ट से जुड़े संस्थानों का स्वामित्व होगा। समझौते के अनुसार, बीएचयू और अन्य सभी साझेदार संस्थान इस नई बौद्धिक संपदा का उपयोग शिक्षा, शिक्षण और आगे के शोध कार्यों के लिए विश्वव्यापी और रॉयल्टी-मुक्त लाइसेंस के तहत कर सकेंगे।

बीएचयू के जीन विज्ञानी प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि इस मल्टीडिसिप्लिनरी प्रोजेक्ट के शुरुवात में जंतु विज्ञान विभाग और एआईएचसी एंड आर्कियोलॉजी के शोधकर्ता जुड़ेंगे उसके बाद कुछ और विभागों को जोड़ने की कवायद होगी। आने वाले दिनों में इस केंद्र के तहत होने वाले शोध निष्कर्षों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित किया जाएगा। शोध के अलावा, इस समझौते के क्रियान्वयन से बीएचयू में अंतरविषयक (इंटरडिसिप्लिनरी) शोध को नई गति मिलेगी। साथ ही, विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और आउटरीच कार्यक्रमों का विस्तार किया जाएगा, जिससे आम जनमानस की भागीदारी और वैज्ञानिक ज्ञान के प्रसार के लिए नए अवसर सृजित होंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी