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बीएचयू की पहल : तमिल टोडा कढ़ाई के संरक्षण और कारीगरों की आजीविका सुदृढ़ करने पर शोध

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बीएचयू की पहल : तमिल टोडा कढ़ाई के संरक्षण और कारीगरों की आजीविका सुदृढ़ करने पर शोध


बीएचयू की पहल : तमिल टोडा कढ़ाई के संरक्षण और कारीगरों की आजीविका सुदृढ़ करने पर शोध


—जीआई मान्यता के बावजूद कारीगरों की आय कम, बाजार विस्तार और बेहतर विपणन नीति पर जोर

वाराणसी, 21 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के कला संकाय की ओर से तमिलनाडु की पारंपरिक टोडा कढ़ाई कला के संरक्षण और इससे जुड़े कारीगरों की आजीविका को सुदृढ़ करने के लिए एक महत्वाकांक्षी शोध परियोजना शुरू की गई है। परियोजना के तहत टोडा कढ़ाई से जुड़े कारीगरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, उनकी चुनौतियों, बाजार की संभावनाओं और नीतिगत हस्तक्षेपों का अध्ययन किया जा रहा है।

—दो वर्ष की परियोजना, 16 लाख रुपये का अनुदान

‘सस्टेनिंग टोडा एम्ब्रॉयडरी: कल्चरल हेरिटेज, मार्केट एक्सपैंशन एंड पॉलिसी इंटरवेंशंस’ विषय पर आधारित यह परियोजना इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (आईसीएसएसआर) की ‘स्पेशल कॉल फॉर प्रोजेक्ट—विकसित भारत @ 2047’ योजना के अंतर्गत संचालित हो रही है। दो वर्ष की इस परियोजना के लिए 16 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई है। परियोजना का शोध प्रस्ताव आईसीएसएसआर, नई दिल्ली में भी प्रस्तुत किया गया है।

इस परियोजना के प्रधान अन्वेषक एवं समन्वयक डॉ. रत्न शंकर मिश्रा, एसोसिएट प्रोफेसर, ऑफिस मैनेजमेंट एंड कंपनी सेक्रेटरीशिप, कला संकाय, बीएचयू हैं। डॉ. विनायक कुमार दुबे, एसोसिएट प्रोफेसर, शारीरिक शिक्षा विभाग, बीएचयू, परियोजना के सह-अन्वेषक हैं।

—टोडा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है कढ़ाई

डॉ. रत्न शंकर मिश्रा के अनुसार, स्थानीय रूप से ‘पुखूर’ के नाम से जानी जाने वाली टोडा कढ़ाई तमिलनाडु के नीलगिरि क्षेत्र में निवास करने वाले टोडा समुदाय की पारंपरिक कला है। अपने विशिष्ट ज्यामितीय डिजाइनों और पारंपरिक सिलाई तकनीक के कारण इसकी अलग पहचान है। यह कला टोडा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के साथ-साथ अनेक परिवारों की आजीविका का साधन भी है।

—जीआई टैग के बावजूद कई चुनौतियां

टोडा कढ़ाई को भौगोलिक संकेतक (जीआई) मान्यता प्राप्त होने के बावजूद कारीगरों को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा है। कम आय, सीमित बाजार पहुंच, कच्चे माल की बढ़ती लागत, नकली उत्पादों की चुनौती और युवा पीढ़ी की घटती भागीदारी जैसी समस्याएं इसके संरक्षण के सामने बड़ी बाधा हैं। शोध परियोजना के माध्यम से इन चुनौतियों के साथ-साथ कारीगरों द्वारा अपनाई जा रही रणनीतियों का भी अध्ययन किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि टोडा कढ़ाई को आर्थिक रूप से अधिक टिकाऊ बनाते हुए उसकी मौलिकता और सांस्कृतिक स्वरूप को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है।

—239 कारीगरों को सर्वेक्षण में किया गया शामिल

अध्ययन में मिश्रित शोध पद्धति अपनाई गई है और वर्णनात्मक विश्लेषण किया जा रहा है। क्षेत्रीय सर्वेक्षण के लिए उद्देश्यपरक नमूना पद्धति का इस्तेमाल किया गया है। इसके तहत 239 टोडा कारीगरों को अध्ययन में शामिल किया गया है।

शोधकर्ताओं ने नीलगिरि जिले में क्षेत्रीय सर्वेक्षण के दौरान कारीगरों के साक्षात्कार लिए हैं। संरचित पारिवारिक सर्वेक्षण और कारीगरों के साक्षात्कार के माध्यम से प्राथमिक आंकड़े जुटाए जा रहे हैं, जबकि द्वितीयक आंकड़े विभिन्न संस्थागत स्रोतों से प्राप्त किए जा रहे हैं।

—उधगमंडलम, कोटागिरी और कूनूर में अध्ययन

परियोजना के तहत नीलगिरि जिले के उधगमंडलम, कोटागिरी और कूनूर राजस्व प्रभागों को अध्ययन क्षेत्र बनाया गया है। यहां कारीगरों की आजीविका, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, बाजार तक पहुंच और पारंपरिक कला के प्रति नई पीढ़ी के रुझान का अध्ययन किया जा रहा है।

—बाजार विस्तार से बढ़ सकती है कारीगरों की आय

परियोजना के तहत मौजूदा विपणन माध्यमों का भी अध्ययन किया जा रहा है, ताकि टोडा कढ़ाई के लिए नए और स्थायी बाजार विकसित करने की संभावनाओं को तलाशा जा सके। शोधकर्ताओं का मानना है कि बेहतर विपणन व्यवस्था, बाजार का विस्तार और प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप कारीगरों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

डॉ. रत्न शंकर मिश्रा के अनुसार, बेहतर विपणन नीति के माध्यम से टोडा समुदाय के लोगों को अपनी पारंपरिक कढ़ाई कला से बेहतर आय सृजित करने के अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं। परियोजना से ऐसी स्थायी रणनीतियां और नीतिगत सुझाव विकसित होने की उम्मीद है, जो एक ओर कारीगरों की आजीविका को मजबूत करें और दूसरी ओर टोडा कढ़ाई को जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने में मदद करें।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी