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पिछले 10 हजार वर्षों में भारत में बड़े पैमाने पर कोई मानव प्रवास या बाहरी आगमन नहीं हुआ : प्रो वलिम्बे

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पिछले 10 हजार वर्षों में भारत में बड़े पैमाने पर कोई मानव प्रवास या बाहरी आगमन नहीं हुआ : प्रो वलिम्बे


— बीएचयू-एएनएसआई पेलियोजीनोमिक्स संगोष्ठी,भारत के प्राचीन मानव इतिहास को नए सिरे से समझने पर जोर

वाराणसी, 23 मार्च (हि.स.)। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के जंतु विज्ञान विभाग में दो दिवसीय पेलियोजीनोमिक्स एवं पेलियोआर्कियोलॉजी संगोष्ठी की शुरूआत सोमवार से हुई। प्राचीन डीएनए, पैलियोएंथ्रोपोलॉजी, गट माइक्रोबायोम और पॉपुलेशन जीनोमिक्स अनुसंधान जैसे महत्वपूर्ण विषयों को एक मंच पर लाने के लिए आयोजित गोष्ठी में भारत के प्राचीन मानव इतिहास को नए सिरे से समझने पर विमर्श हुआ।

गोष्ठी के प्रथम सत्र में प्रो. एस.आर. वालिम्बे (पूर्व अध्यक्ष, मानवशास्त्र विभाग, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय) ने बताया कि पिछले 10,000 वर्षों में भारत में बड़े पैमाने पर कोई मानव प्रवास या बाहरी आगमन नहीं हुआ। अपने शोध निष्कर्ष का जिक्र कर उन्होंने बताया कि भारत पर न तो कोई बड़े आक्रमण हुए, न ही लाखों-करोड़ों लोगों का सामूहिक स्थानांतरण। इसके बजाय, केवल व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान या सीमित व्यक्तिगत, समूह स्तर के छोटे-मोटे प्रवास ही दर्ज किए गए हैं।

प्रो. वालिम्बे ने दशकों तक दक्कन कॉलेज और पुणे विश्वविद्यालय में 65 से अधिक पुरातात्विक स्थलों (8000 बीसीई से 800 सीई तक) के कंकालों का अध्ययन किया है। उन्होंने बताया कि प्राचीन कंकालों के अध्ययन से देखा गया है कि उत्तर-पश्चिम भारत से लेकर दक्षिण तक, हड़प्पा काल (लगभग 4500-1900 ईसा पूर्व) से लेकर बाद के कालों में शारीरिक विशेषताओं में क्रमिक निरंतरता बनी रही। लंबे सिर से चौड़े सिर की ओर धीरे-धीरे होने वाला बदलाव स्थानीय अनुकूलन और विकास का परिणाम है, न कि किसी बड़े बाहरी समूह के आगमन का।

इसके पहले प्राणि विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. मुनीयंदी सिंगारवेल, ने स्वागत भाषण में विभाग की 105 वर्ष पुरानी विरासत, जेनेटिक्स, साइटोजेनेटिक्स, एंडोक्राइनोलॉजी और विकासवादी जीवविज्ञान में अग्रणी भूमिका,यूजीसी सेंटर ऑफ एडवांस्ड स्टडी की उपलब्धियों और प्रसिद्ध पूर्व छात्रों जैसे डॉ. लालजी सिंह, डॉ कानूनगो, डॉ. अशोक अग्रवाल, डॉ. आलोक भट्टाचार्य आदि का उल्लेख किया।

विज्ञान संस्थान के डीन, प्रो. आर.के. श्रीवास्तव, ने कहा कि “डीएनए मूल रूप से प्राणिविज्ञान का हिस्सा है। यह सहयोग हमें जूक्रनालजी’ की दिशा में ले जाएगा, जो भारतीय वंशावली और अन्य जगहों के आबादी के बीच संबंधों को उजागर करेगा।

गोष्ठी में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के एडिशनल डायरेक्टर जनरल डॉ संजय मंजुल ने इस पहल का स्वागत किया और कहा कि एएसआई इस शोध में पूरा सहयोग करेगी। आइएसएल भुवनेश्वर के डायरेक्टर डॉ देबासीस दास ने जंतु विज्ञान विभाग के कार्यो को याद किया और कार्यक्रम की सराहना की।

प्रो. एस.सी. लखोटिया ने कहा कि “जेनेटिसिस्ट के रूप में मुझे लगता है कि यह दोनों क्षेत्रों के लिए शानदार अवसर है। इससे मानव विकास की स्पष्ट और संपूर्ण कहानी सामने आएगी।” प्रो. राजीव रमन ने कहा कि “मानव पृथ्वी के सबसे जटिल प्राणी हैं। यह संगोष्ठी उन ताकतों और तंत्रों को उजागर करेगी जिन्होंने हमें आज का रूप दिया। डॉ बी पी उराडे, उप निदेशक, मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण भारत, ने धन्यवाद ज्ञापन में कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी को प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए और प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे को इस सहयोग के मुख्य आधार और समन्वयक होने के लिए विशेष आभार जताया।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी