home page

बीएचयू के विद्यार्थियों को अभिनेता संजय मिश्र ने सिखाए जिंदगी के गुर, संघर्ष पर दिया जोर

 | 
बीएचयू के विद्यार्थियों को अभिनेता संजय मिश्र ने सिखाए जिंदगी के गुर, संघर्ष पर दिया जोर


बीएचयू के विद्यार्थियों को अभिनेता संजय मिश्र ने सिखाए जिंदगी के गुर, संघर्ष पर दिया जोर


विज्ञान संस्थान के महामना हाल में हिंदी दिवस मनाया गया अचिंत्य 6.0 का हुआ विमोचन

वाराणसी, 15 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय के महामना हाल में मंगलवार को अभिनेता संजय मिश्र ने विद्यार्थियों को सफल होने के लिए टिप्स देने के साथ जिंदगी के गुर भी सिखाएं। हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी प्रकाशन समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम में अभिनेता ने हिन्दी भाषा की सराहना कर कहा कि “मैं एक्टर की लाइफ जीता हूँ। मुझे बनारस बहुत पसंद है। बनारस एक खूबसूरत सोच है। ये सिखाता है की जो आप हैं वही रहिए। बनारसी हैं तो बनारसी बने रहिए। यहाँ की गलियों में हम घूमे हैं गमछा पहन कर।” उनके इन शब्दों पर हाल में तालियाँ गूँज उठीं। बनारस से उनका लगाव साफ झलक रहा था। उन्होंने शहर की गलियों, घाटों और आम जीवन की सादगी को अपनी कला से जोड़कर बात की।

अभिनेता ने परिसर स्थित केंद्रीय विद्यालय की याद करते हुए बताया कि वहाँ भारत का नक्शा बनाने में उनका भी हाथ रहा। ये छोटी-छोटी यादें उन्होंने विद्यार्थियों के सामने इस तरह रखीं कि मंच और दर्शक के बीच की दूरी खत्म हो गई। उन्होंने अपनी स्कूली यादें साझा करते हुए हँसी-मजाक के साथ कहा कि एक बार स्कूल आधे घंटे लेट पहुँचे क्योंकि रास्ते में समोसा खा रहे थे। टीचर ने पकड़ लिया तो उन्होंने कहा कि मम्मी बीमार हैं। टीचर ने आवेदन लिखने को कहा। उन्होंने 18 पेज लिख डाले, लेकिन ठीक से लिख नहीं पाए। सिनेमा से अपने पुराने लगाव को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें शुरू से फिल्में देखने का शौक था। प्रोफेशन को समय देने और दिल की आवाज सुनने की सलाह देते हुए उन्होंने घाघ कवि का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “जरूरी है आप बढ़िए, लेकिन अपनी जमीन मत छोड़िए। पढ़ाई को टेंशन में मत लो। अपने जमीन को जानिए।” मातृभाषा और संस्कृति से जुड़ने की बात करते हुए उन्होंने कहा कि निर्देशक भी मातृभाषा के जरिए अपनी संस्कृति से जुड़ता है। उनका संदेश साफ था, आगे बढ़ो, लेकिन अपनी जड़ें मत छोड़ो। विद्यार्थियों ने खुलकर सवाल पूछे और संजय मिश्र ने बिना किसी बनावट के जवाब दिए। उन्होंने बताया, “चाणक्य में मैंने 28 टेक लिए थे और आज मैं एक टेक में काम करता हूँ। मैं पढ़ने में कभी बहुत अच्छा नहीं रहा। मैं इतिहास पढ़ना नहीं चाहता था, मैं इतिहास देखना चाहता था। मैं आज भी अपनी स्क्रिप्ट नहीं पढ़ता हूँ।” उन्होंने संघर्ष पर जोर देते हुए कहा, “असफलता का स्वाद चखो, तब सफलता का मतलब समझ आएगा। संघर्ष सिर्फ आपका है, कोई साथ नहीं देगा। मौका मिलते ही चौका मार देना है।”

इसके पहले खचाखच भरे हाल में मंच पर जब अभिनेता संजय मिश्र पहुँचे तो तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँज उठा। कार्यक्रम का संचालन दीपांशी अग्रवाल ने किया। विज्ञान संस्थान के डीन-डायरेक्टर ने मुख्य अतिथि का पुष्पगुच्छ और स्मृति चिह्न देकर सम्मान किया। इसी समारोह में पत्रिका अचिंत्य 6.0 का विमोचन भी संपन्न हुआ, जिसका शीर्षक क्षितिज के परे रहा।

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथि सम्मान और हिंदी भाषा के महत्व पर संक्षिप्त उद्बोधन से हुई।

इस अवसर पर प्रोफेसर एस.पी. सिंह, प्रोफेसर एस.के. मिश्र और प्रोफेसर मनोज श्रीवास्तव प्रोफेसर राघव मिश्र, प्रोफेसर रजनीकांत मिश्र, डॉ भूपेंद्र कुमार, पर उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में डॉ. चंद्रशेखर पति त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी