काशी से “भारत संवाद” अभियान का आगाज, सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पर जोर
—जमीयत सद्भावना मंच की पहल, धर्मगुरुओं, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने साझा विरासत और संवाद को बताया समय की जरूरत
वाराणसी, 14 मई (हि.स.)। जमीयत सद्भावना मंच, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के तत्वावधान में गुरुवार को रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर, वाराणसी में “भारत संवाद” अभियान का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न धर्मों, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिक समाज से जुड़े धर्मगुरुओं, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं युवाओं ने भाग लिया। सम्मेलन में संवाद, सामाजिक सद्भाव, संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री संकट मोचन मंदिर के महंत एवं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्रा ने कहा कि काशी भारत की साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इस मिट्टी में सभी समुदायों का समान योगदान और इतिहास शामिल है। अगर किसी समुदाय को देश से निकालने की बात की जाती है तो पहले इस मिट्टी को निकालना होगा, क्योंकि इस मिट्टी में हर समुदाय का खून शामिल है।
सभा में डायोसिस ऑफ वाराणसी के बिशप राइट रेव. डॉ. यूजीन जोसेफ ने कहा कि मजबूत समाज के लिए केवल बोलना ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे को सुनना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज समाज में गलतफहमियाँ इसलिए बढ़ रही हैं क्योंकि लोग एक-दूसरे को समझने की कोशिश कम कर रहे हैं। प्रथम सत्र “संवाद और सद्भाव” में पूर्व निदेशक, गांधीयन इंस्टीट्यूट ऑफ स्टडीज़ प्रो. दीपक मलिक ने समाज के अंतिम व्यक्ति तक संवाद पहुँचाने और ग्राम स्तर पर संवाद सभाओं के आयोजन पर बल दिया।
बीएचयू के प्रोफेसर प्रो. आर.के. मंडल ने भयमुक्त समाज को लोकतंत्र की बुनियाद बताते हुए कहा कि वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है जब समाज डर और भेदभाव से मुक्त हो। ब्राह्मण महासभा के महासचिव राकेश रंजन त्रिपाठी ने समाज के वंचित और उपेक्षित वर्गों के साथ संवाद को सामाजिक समरसता के लिए आवश्यक बताया। सामाजिक कार्यकर्ता श्रुति नागवंशी ने कहा कि समाज जाति, वर्ग और विचारधारात्मक खाँचों में बंटता जा रहा है, जिसे समाप्त कर मानवीय मूल्यों और सामाजिक समरसता को मजबूत करने की जरूरत है।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे जमीयत सद्भावना मंच के संयोजक मेहदी हसन ऐनी क़ासमी ने कहा कि “भारत संवाद” का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों और विचारधाराओं के बीच रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देना तथा सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है।
द्वितीय सत्र “राष्ट्र निर्माण में संवाद की भूमिका” में कबीर चौरा मठ के चिंतक उमेश कबीर ने संत कबीरदास की वाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि अहिंसा, सच्चाई और सद्भाव को जीवन का हिस्सा बनाना होगा। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव एवं वरिष्ठ लेखक संजय श्रीवास्तव ने कहा कि आज समाज में फैल रही कटुता और नफरत चिंता का विषय है और देश को सबसे ज्यादा जरूरत सद्भाव और आपसी विश्वास की है।
मौलाना अमीनुल हक अब्दुल्ला कासमी, महासचिव, जमीयत उलमा-ए-उत्तर प्रदेश ने कहा कि वर्तमान समय में समाज के विभिन्न तबकों के बीच दूरियाँ और मनभेद बढ़ते जा रहे हैं, जिन्हें केवल संवाद, आपसी विश्वास और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से ही समाप्त किया जा सकता है।
ज्ञानवापी मस्जिद के इमाम मुफ्ती अब्दुल बातिन नोमानी ने कहा कि सभी धर्मगुरुओं और सामाजिक संगठनों को मिलकर जमीनी स्तर पर नफरत और विभाजनकारी सोच के खिलाफ कार्य करना होगा। उन्होंने कहा कि समाज में बढ़ती दूरियों और गलतफहमियों को केवल आपसी संवाद, भाईचारे और इंसानियत के माध्यम से ही समाप्त किया जा सकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जमीयत उलमा-ए-उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मुफ्ती अफ्फान मंसूरपुरी ने की। संभा को पर्यावरण कार्यकर्ता एकता शेखर , भानुजा शरण लाल, प्रो. प्रियंकर उपाध्याय, डॉ. मनोज मिश्रा, पंकज पति पाठक, अशोक दास, असद कमाल लारी, व्योमेश शुक्ल आदि ने भी संबोधित किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

