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यूपी के हमीरपुर में अनोखा दंगल, घूंघट वाली महिलाएं अखाड़े में भिड़ीं

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यूपी के हमीरपुर में अनोखा दंगल, घूंघट वाली महिलाएं अखाड़े में भिड़ीं


-एक दूसरे को दी पटकनी, गांव के पुरुष घरों में रहे कैद

हमीरपुर, 29 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के एक छोटे से गांव में आज सैकड़ों साल पुरानी परम्परा में महिलाओं ने अखाड़े में दांवपेंच दिखाए। घूंघट वाली महिलाओं ने दंगल में एक दूसरे को मात दी। बारिश के मौसम में महिलाओं के अनोखे दंगल के आसपास पुरुषाें की नो एन्ट्री रही। महिलाएं लाठी लेकर अखाड़े के चारों और मुस्तैद रहीं। देर शाम तक चले दंगल में गांव की सरपंच ने कुश्ती लडऩे वाली महिलाओं को सम्मानित भी किया।

बुंदेलखंड के हमीरपुर जिले के मुस्करा क्षेत्र के लोदीपुर निवादा गांव में वर्षों पुरानी परम्परा में आज महिलाओं के दंगल की धूम मची। बारिश थमने के बाद शाम को गांव के बीच अखाड़े में घूंघट वाली महिलाओं ने एक दूसरे को उठा-उठाकर पटका। गांव की सरपंच गिरजा देवी ने महिलाओं के दंगल का शुभारंभ किया। दंगल में घूंघट वाली रामा देवी गुप्ता ने गिरजा को अखाड़े में पटकनी दे दी। वहीं रानी ने गत्तों, मनीषा पाल ने खुशबू पाल को धूल चटाई। दंगल में संपत सविता और ज्ञान देवी के बीच कुश्ती कराई गई। इसमें संपत सविता विजयी रहीं। वहीं केसर ने बबली साहू को अखाड़े में कई पटकनी दी। देर शाम तक चले दंगल में घूंघट वाली माया और गौरी ने अपनी सहेलियों को दांवपेंच से जमीन पर गिरा दिया। दंगल में शिव कुमारी, रामरती, ज्ञानवती पाल, प्यारी, हीरा, सुनीता, फूलमती और फूलारानी समेत तमाम महिलाओं ने अखाड़े में दांवपेंच दिखाए। दंगल के समापन पर गांव की सरपंच ने विजयी और उपविजयी महिलाओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया।

महिलाओं के दंगल के आसपास पुरुषों को नो एन्ट्री

गांव की सरपंच गिरजा देवी ने बताया कि हर साल रक्षाबंधन के दूसरे दिन शाम को यहां गांव में सिर्फ महिलाओं का दंगल होता है। यह सदियों पुरानी परम्परा है। इसमें पूरे गांव की महिलाएं एकत्र होती हैं। घूंघट वाली महिलाओं के साथ ही बुजुर्ग महिलाएं भी अखाड़े में उतरती हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश का लोदीपुर निवादा ही ऐसा गांव है जहां महिलाओं का दंगल साल में एक बार होता है। सरपंच ने बताया कि यह दंगल आजादी के पहले से लगातार हर साल आयोजित होता आ रहा है। दंगल बुंदेली परम्परा में महिलाओं की शौर्य गाथा का एक अच्छा उदाहरण भी है।

सरपंच ने बताया कि महिलाओं के दंगल में पुरुषों की नो एन्ट्री रहती है। यदि कोई भी पुरुष दंगल के आसपास आने की कोशिश करता है तो लाठी से लैस महिलाएं उन्हें खदेड़ देती हैं। दंगल के दौरान परुष घरों में ही रहते हैं। या फिर गांव से बाहर चले जाते हैं। महिलाओं के दंगल से पहले पूरे गांव की महिलाएं सामूहिक रूप से कजली निकालती हैं। गांव के मंदिरों में माथा टेकने के बाद मंगल गीत गाते हुए महिलाएं अखाड़े में पहुंचती हैं। दंगल में बुजुर्ग महिला ही ढोल बजाती हैं।

गांव के सरपंच प्रतिनिधि नाथूराम वर्मा व सुरेश शुक्ला ने बताया कि बुजुर्गों ने इस परम्परा की शुरुआत होने की कहानी सुनी थी। गुलामी के समय में ब्रिटिश फौज के अत्याचार का प्रतिकार करने और आत्मरक्षा के लिए महिलाओं को प्रशिक्षित करने की मंशा से दांवपेंच सिखाए गए थे। उसके बाद झांसी की रानी के बलिदान से प्रेरित होकर महिलाओं ने दंगल में भाग लेना शुरू कर दिया था। दंगल में ढोल बजाने से लेकर रेफरी तक की भूमिका निभाने की जिम्मेदारी महिलाओं पर ही होती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज मिश्रा