शारदीय नवरात्र : वाराणसी में सातवें दिन मां कालरात्रि के दरबार में उमड़ा आस्था का सैलाब
—भोर से ही दर्शन-पूजन के लिए लगीं कतारें, श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला जारी
—मां महिषासुर मर्दिनी, अन्नपूर्णा और संकठा मंदिर में भी भक्तों की भारी भीड़
वाराणसी, 17 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी शारदीय नवरात्र के सातवें दिन शनिवार को मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की आराधना में सराबोर रही। देवी मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के निकट कालिका गली स्थित मां कालरात्रि के दरबार में भोर होते ही दर्शन-पूजन के लिए भक्तों की लंबी कतारें लग गईं। पूरे परिसर में माता के जयकारे गूंजते रहे और भक्तों ने विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की।
मां कालरात्रि के दरबार में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि के दर्शन के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु काशी पहुंचे। भक्तों ने माता को माला-फूल, गुड़हल के पुष्प, चुनरी, नारियल, फल, मिष्ठान, सिंदूर, रोली, इत्र और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की। धूप-बत्ती और लोहबान की सुगंध से मंदिर परिसर भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालु माता की स्तुति करते हुए सुख-शांति, समृद्धि और संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करते रहे।
काशी की अधिष्ठात्री देवी हैं मां कालरात्रि
मंदिर के महंत पं. सुरेंद्र तिवारी 'गुल्लू' के अनुसार, मां कालरात्रि काशी की अधिष्ठात्री देवी हैं और उनका उल्लेख काशीखंड में मिलता है। मान्यता है कि भगवान शिव से रुष्ट होकर माता पार्वती यहां आई थीं। उन्होंने सैकड़ों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। मंदिर की विशिष्ट धार्मिक मान्यता और आध्यात्मिक महत्ता के कारण यहां वर्षभर श्रद्धालुओं का आगमन होता है।
महंत के अनुसार, सच्चे मन से मां की आराधना करने वाले भक्तों को उनके विकराल रौद्र रूप के साथ ममतामयी स्वरूप का भी अनुभव होता है। मंदिर परिसर में गौरी केदारेश्वर लिंग स्वरूप के साथ नील सरस्वती, भगवान गणेश, भगवान विष्णु सहित कई अन्य देवी-देवताओं के विग्रह भी स्थापित हैं। मान्यता है कि अटूट श्रद्धा और विश्वास के साथ माता से प्रार्थना करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। काशी में यह भी विश्वास है कि मां कालरात्रि के दर्शन-पूजन से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
दुष्टों का संहार करने वाली हैं मां कालरात्रि
ज्योतिषविद् एवं मां दुर्गा के उपासक रविंद्र तिवारी ने बताया कि मां कालरात्रि आदिशक्ति का वह स्वरूप हैं जो दुष्टों और आसुरी शक्तियों का संहार करती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी ने चंड-मुंड और रक्तबीज सहित अनेक राक्षसों के वध के लिए यह उग्र स्वरूप धारण किया था। चंड-मुंड के संहार के कारण देवी को चामुंडा के नाम से भी जाना जाता है।
मां कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत विकराल और रौद्र वर्णित है। उनका वर्ण अंधकार के समान श्याम है। केश खुले रहते हैं और गले में मुंडमाला सुशोभित होती है। उनके स्वरूप में अस्त्र-शस्त्र और दैत्य संहार के प्रतीक भी दिखाई देते हैं। देवी का वाहन गर्दभ है। धार्मिक मान्यता है कि मां कालरात्रि के दर्शन और आराधना से भय, नकारात्मकता तथा जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
अन्य देवी मंदिरों में भी चला पूजन-अर्चन
नवरात्र के सातवें दिन काशी के अन्य प्रमुख देवी मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। भोजूबीर-पंचक्रोशी परिक्रमा मार्ग स्थित दक्षिणेश्वरी काली मंदिर में भक्तों ने मां के दर्शन किए। इसके अलावा मां महिषासुर मर्दिनी मंदिर, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर स्थित मां अन्नपूर्णा मंदिर, संकठा मंदिर, चौसट्ठी देवी मंदिर, तारा मंदिर, सिद्धेश्वरी मंदिर और कमच्छा स्थित कामाख्या मंदिर में भी पूरे दिन पूजन-अर्चन का क्रम चलता रहा। नवरात्र के सातवें दिन काशी के देवी मंदिरों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ ने पूरे शहर को भक्तिमय बना दिया।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

