कलियुग में पेड़-पहाड़ बचाना सबसे बड़ा धर्म : पं. विष्णुधर द्विवेदी
मीरजापुर, 08 मई (हि.स.)। जिगना क्षेत्र के परमानपुर गांव स्थित गंगा तट पर चल रही संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन शुक्रवार को कथा व्यास पं. विष्णुधर द्विवेदी ने पूतना मोक्ष और भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा सुन श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
कथा व्यास ने कहा कि पूतना अविद्या का प्रतीक है। जब अविद्या शरीर रूपी घर में प्रवेश करती है तो प्रारंभ में आकर्षक लगती है, लेकिन बाद में वही विकराल रूप धारण कर मनुष्य का जीवन नष्ट कर देती है। उन्होंने पूतना रूपी अविद्या को काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, मत्सर और अहंकार से जोड़ते हुए इनसे दूर रहने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल में अनेक दैत्यों का उद्धार किया, कालिया नाग का मर्दन किया और दावानल से ब्रजवासियों की रक्षा की। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक भौतिक बंधनों से मुक्ति चाहता है, लेकिन इसके लिए प्रकृति और धर्म के प्रति श्रद्धा जरूरी है।
पं. द्विवेदी ने पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि आने वाले समय में मनुष्य पेड़-पहाड़ों को काटकर प्रकृति का संतुलन बिगाड़ देगा। इसी कारण भगवान ने पर्वत और वृक्षों की पूजा का विधान बताया। उन्होंने मैहर, अष्टभुजा, कामाख्या, नैना देवी, वैष्णो देवी, केदारनाथ और बद्रीनाथ का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकृति में ही ईश्वर का वास है।
उन्होंने लोगों से जीवन में कम से कम 21 पेड़ लगाने का आह्वान किया, ताकि आने वाली पीढ़ियों को ऑक्सीजन, जल और सुरक्षित जीवन मिल सके।
कथा में यजमान रामनिवास पांडेय, जय देवी, लाल साहब मिश्र, महेंद्र देव पांडेय, श्रीकांत उपाध्याय, दिलीप शुक्ला, आशीष मिश्रा, राधे मिश्रा, पीयूष गोयल, सुधीर, सुनील, सुजीत, पप्पू, कमलेश पांडेय, सुशांत, दिव्यांश और निधि पांडेय सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / गिरजा शंकर मिश्रा

