क्षेत्रीय भाषाओं ने थामी राष्ट्र की डोर, भारत के निर्माण में निभाई बड़ी भूमिका : डॉ. नीलकंठ तिवारी
- भारतीय भाषा समागम-2026 में बोले- ज्ञान की प्राप्ति करनी है तो काशी से बेहतर कोई स्थान नहीं
वाराणसी, 13 सितम्बर (हि.स.)। काशी केवल धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन की विश्व की विशिष्ट भूमि है। प्रयाग, अयोध्या और मथुरा भक्ति से जुड़ी धार्मिक नगरी हैं, लेकिन ज्ञान की प्राप्ति करनी है तो काशी से बेहतर स्थान नहीं हो सकता।
यह बातें रविवार को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में हिन्दुस्थान समाचार की ओर से आयोजित भारतीय भाषा समागम-2026 में विशिष्ट अतिथि विधायक डॉ. नीलकंठ तिवारी ने कहीं।
उन्होंने कहा कि इतने विद्वानों के बीच इस मंच से बोलना उनके लिए भिक्षुक के समान है, क्योंकि यहां आने वाला व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है। हिन्दुस्थान समाचार परिवार और अरविंद जी जिस तरह शोध और खोज के बाद विषय सामने लाते हैं, उससे उस विषय को सुनने और समझने की स्वाभाविक रुचि पैदा होती है।
काशी की ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने शंकराचार्य से जुड़ा प्रसंग सुनाया। कहा कि काशी में ज्ञान की परंपरा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहां प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर के दर्शन करने की दृष्टि विकसित हुई। शंकराचार्य और स्वच्छता कर्मी से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्हें यह स्मरण कराया गया कि सभी के भीतर एक ही ईश्वर का वास है, तब उन्होंने उस व्यक्ति में साक्षात भगवान के दर्शन किए। काशी में शंकराचार्य को भी ज्ञान की पूर्णता प्राप्त हुई।
काशी की गलियों की सफाई भी आध्यात्मिक चिंतन
डॉ. तिवारी ने अपने स्वच्छता अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि वह पिछले 57 दिनों से काशी की गलियों में झाड़ू लेकर निकल रहे हैं। कई लोग पूछते हैं कि वे रोज ऐसा क्यों करते हैं। उन्होंने कहा कि काशी की गलियों में घूमना भी देव पूजा, अध्यात्म चिंतन और दर्शन है। यहां तीन अंतरगृह की परिक्रमा होती है और ये परिक्रमा काशी की गलियों से होकर गुजरती है। इसलिए इन गलियों की सफाई भी आध्यात्मिक चिंतन और पुण्य का कार्य है।
संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं का योगदान अहम
उन्होंने संस्कृत भाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्कृत को विश्व की प्राचीनतम लिखित भाषाओं में माना जाता है और ऋग्वेद के प्रथम सूक्त का उदाहरण देते हुए उन्होंने इसकी प्राचीनता और ज्ञान परंपरा को रेखांकित किया। इसके साथ ही उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं के योगदान को भी उतना ही महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि रामायण और रामचरितमानस इसका बड़ा उदाहरण हैं। रामायण की परंपरा को गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया। इसी तरह सूरदास जैसे संत कवियों ने क्षेत्रीय भाषाओं में रचनाएं कर समाज को जोड़ा। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं का उल्लेख है, जबकि देश में हजारों बोलियां प्रचलित हैं।
भाषाओं ने देश की विविधता को एकसूत्र में बांधा
उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं ने केवल साहित्य को समृद्ध नहीं किया, बल्कि भारत की समृद्धि, रक्षा, राष्ट्रीय स्वरूप और राष्ट्रीयता के निर्माण में भी बड़ी भूमिका निभाई है। भाषाओं ने देश की विविधता को एक सूत्र में बांधने का काम किया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

