वैज्ञानिक तरीके से विवेचना करने पर ही मजबूत होंगे मेडिको-लीगल के मामले : डॉ. राजेश कुमार राय
मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज की पांच दिवसीय कार्यशाला का समापन, 1100 से अधिक पुलिस अधिकारियों ने लिया प्रशिक्षण
प्रयागराज, 31 जुलाई (हि.स.)। मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं विष विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं कार्यशाला के संयोजक डॉ. राजेश कुमार राय ने शुक्रवार को मीडिया से वार्ता करते हुए कहा कि घटनास्थल की विवेचना को वैज्ञानिक और साक्ष्य आधारित बनाना आवश्यक है। अपराध के तरीके तेजी से बदल रहे हैं, ऐसे में पुलिस अधिकारियों को भी नवीनतम वैज्ञानिक विधियों, तकनीकों और उपकरणों का निरंतर प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है। इससे मेडिको-लीगल मामलों की जांच अधिक प्रभावी होगी और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत आधार मिलेगा।
मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं विष विज्ञान विभाग की ओर से आयोजित मेडिको-लीगल मामलों की विवेचना में पुलिस अधिकारियों के कौशल संवर्धन विषयक पांच दिवसीय कार्यशाला का शुक्रवार को समापन हुआ। कार्यशाला में प्रयागराज कमिश्नरेट के लगभग 1100 से अधिक पुलिस अधिकारियों को वैज्ञानिक विवेचना और जांच का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
डॉ. राजेश कुमार राय ने बताया कि कार्यशाला में प्रतिदिन प्रयागराज कमिश्नरेट के करीब 250 विवेचना अधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में सभी सहायक पुलिस आयुक्त और अपर पुलिस आयुक्त भी उपस्थित रहे। पांच दिनों में अधिकारियों को अपराध की वैज्ञानिक जांच से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी दी गई।
उन्होंने बताया कि प्रत्येक दिन चार शैक्षणिक सत्र और एक प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया। फॉरेंसिक मेडिसिन और फॉरेंसिक साइंस के विशेषज्ञों ने अधिकारियों को घटनास्थल को सुरक्षित रखने, वैज्ञानिक साक्ष्यों के संरक्षण एवं संग्रह, घटनास्थल के वैज्ञानिक निरीक्षण और प्रलेखन, शव के सुरक्षित प्रबंधन एवं परिवहन, सूक्ष्म साक्ष्यों की पहचान और पैकेजिंग की जानकारी दी।
कार्यशाला में पोस्टमार्टम निरीक्षण के महत्व और मेडिको-लीगल रिपोर्ट को वैज्ञानिक ढंग से समझने के साथ आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों के प्रभावी उपयोग पर भी प्रशिक्षण दिया गया।
डॉ. राय ने बताया कि पहले सत्र में घटनास्थल को सुरक्षित रखने, साक्ष्यों को दूषित होने से बचाने, सही तरीके से संग्रह करने, भीड़ नियंत्रण तथा फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के मानकों की जानकारी दी गई। दूसरे सत्र में शव को घटनास्थल से उठाने, सुरक्षित परिवहन करने और शवगृह तक पहुंचाने की वैज्ञानिक प्रक्रिया समझाई गई, ताकि महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट न हों।
उन्होंने बताया कि तीसरे सत्र में सूक्ष्म साक्ष्यों के संग्रह, उनके उचित रख-रखाव और साक्ष्य की श्रृंखला (चेन ऑफ कस्टडी) बनाए रखने की प्रक्रिया बताई गई। इससे प्रयोगशाला तक पहुंचने वाले साक्ष्यों की विश्वसनीयता बनी रहे और उनका वैज्ञानिक विश्लेषण सही तरीके से हो सके।
अंतिम सत्र में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में प्रयुक्त चिकित्सकीय शब्दों और उनके व्यावहारिक अर्थ को समझाया गया। इसमें फांसी, डूबना, गला दबाना, दम घुटना, मृत्यु के बाद रक्त का जमाव और शरीर में अकड़न जैसी स्थितियों से संबंधित चिकित्सकीय जानकारी को समझने का प्रशिक्षण दिया गया, ताकि पुलिस अधिकारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का सही अर्थ निकाल सकें।
डॉ. राय ने कहा कि विज्ञान के विकास के साथ अपराध करने के तरीके भी बदल रहे हैं। इसलिए अपराध की जांच और न्याय से जुड़ी संस्थाओं को भी समय के साथ वैज्ञानिक रूप से सक्षम बनाना होगा।
उन्होंने कहा कि संसाधनों की कमी और पुलिस अधिकारियों के सीमित समय के बावजूद घटनास्थल की जांच में वैज्ञानिक सावधानियों का पालन करने का प्रयास किया जाना चाहिए। यह प्रशिक्षण इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल

