दृढ़ संकल्प और साधना से बदली रत्नाकर ने अपने जीवन की दिशा : सरोज दुबे
ज्वाला देवी इंटर कॉलेज में श्रद्धा और उत्साह से मनाई गई महर्षि वाल्मीकि जयंती
प्रयागराज, 26 अक्टूबर (हि.स.)। सच्चे मन, दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से मनुष्य अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। डाकू रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि बनने का सफर इसका प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने कठोर तपस्या और साधना के बल पर महर्षि का स्थान प्राप्त किया और विश्व के प्रथम महाकाव्य रामायण की रचना की। रामायण आज भी हमें सत्य, त्याग, मर्यादा और कर्तव्यनिष्ठा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह बातें ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, सिविल लाइंस के वरिष्ठ आचार्य सरोज दुबे ने महर्षि वाल्मीकि जयंती के अवसर पर कहीं।
विद्यालय में महर्षि वाल्मीकि जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। कार्यक्रम का शुभारंभ महर्षि वाल्मीकि के चित्र पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुआ। इस दौरान विद्यालय परिसर में भक्तिमय वातावरण रहा।
मुख्य वक्ता सरोज दुबे ने महर्षि वाल्मीकि के जीवन और उनके योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने रामायण के माध्यम से समाज को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र से परिचित कराया। उनके विचार आज भी लोगों को जीवन में नैतिक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
आदर्शों को जीवन में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि
विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. राकेश कुमार सिंह ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि महर्षि वाल्मीकि सामाजिक समरसता, समानता और मानवता के प्रतीक थे। उन्होंने अपने जीवन और विचारों से संदेश दिया कि सभी मनुष्य समान हैं। उनकी जयंती मनाने की सार्थकता तभी है, जब हम उनके ज्ञान, उपदेशों और आदर्शों को अपने व्यवहार में अपनाएं। केवल आयोजन करने से नहीं, बल्कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने से ही महर्षि वाल्मीकि के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की जा सकती है।
कार्यक्रम के अंत में विद्यालय के व्यवस्था प्रमुख दीपक यादव ने विद्यार्थियों और आचार्यों को महर्षि वाल्मीकि जयंती की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि महापुरुषों की जयंती हमें अपनी संस्कृति और संस्कारों से जोड़ती है। इस अवसर पर विद्यालय के समस्त आचार्य और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल

