सत्य की खोज में कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहयोगी, लेकिन अनुभूति का विकल्प नहीं : स्वामी मित्रानंद
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मानव चेतना विषय पर विशेष संवाद, विशेषज्ञों ने तकनीक के विवेकपूर्ण उपयोग पर दिया जोर
प्रयागराज, 14 अगस्त (हि.स.)। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आज जीवन के कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो रही है, लेकिन यह मानव की मौलिकता, अनुभूति और चेतना का विकल्प नहीं बन सकती। मनुष्य सत्य की खोज में एआई की सहायता ले सकता है, लेकिन अंतिम अनुभव और आत्मबोध मनुष्य को स्वयं ही प्राप्त करना होगा। यह बातें चिन्मय मिशन, चेन्नई के आध्यात्मिक मार्गदर्शक पूज्य स्वामी मित्रानंद ने शुक्रवार को सिविल लाइंस स्थित जिला पंचायत सभागार में आयोजित विशेष संवाद सत्र में कहीं।
शंख प्रयागराज के तत्वावधान में चिन्मय मिशन अमृत महोत्सव के अवसर पर ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मानव चेतना’ विषय पर संवाद सत्र आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता स्वामी मित्रानंद ने कहा कि भारत ने सत्य को जानने की अपनी खोज कभी नहीं छोड़ी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक नए युग के रूप में सामने आई है, लेकिन इससे सत्य की खोज समाप्त नहीं होगी। मनुष्य सत्य को समझने और जानकारी प्राप्त करने में एआई का सहयोग ले सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत अपनी परंपरा और तकनीक के समन्वय के लिए जाना जाता है। दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ना संभव है। उन्होंने बताया कि वह स्वयं भी अपने कार्यों में एआई की सहायता लेते हैं और मिडजर्नी तथा नैनो बनाना जैसे अनुप्रयोगों का उपयोग करते हैं। उनकी टीम ने एआई की सहायता से भगवद्गीता को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसके अलावा संपूर्ण कंबन रामायण को तमिल भाषा में एआई के माध्यम से प्रस्तुत करने का काम भी किया गया है।
स्वामी मित्रानंद ने कहा कि एआई अभी एक तकनीक है। वह कृत्रिम है, मौलिक नहीं। इसके माध्यम से पृथ्वी पर बहुत से कार्य किए जा सकते हैं, लेकिन मोक्ष और अनुभूति को एआई के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता। एआई से जानकारी और स्पष्टता हासिल की जा सकती है, लेकिन उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारने के बाद ही वास्तविक परिवर्तन संभव होता है।
एआई मानव चेतना का विकल्प न बने : न्यायमूर्ति के. अजित कुमार
मुख्य अतिथि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के. अजित कुमार ने कहा कि हर आविष्कार के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू होते हैं। एआई के साथ भी यही बात लागू होती है। यदि मनुष्य हर काम के लिए एआई पर निर्भर होने लगे और अपने मन तथा चिंतन को उससे अलग कर दे, तो उसकी कई मानवीय क्षमताएं कमजोर हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि आत्मचेतना मनुष्य में पहले से मौजूद है। एआई का उपयोग मानव जीवन को बेहतर बनाने और क्षमताओं के विस्तार के लिए होना चाहिए, न कि मानव चेतना के विकल्प के रूप में।
विशिष्ट अतिथि आचार्य शंतनु महाराज ने कहा कि एआई स्वयं मानव चेतना की देन है। कोई उत्पाद अपनी मूल वस्तु का विकल्प नहीं हो सकता। एआई उत्तर दे सकता है, लेकिन प्रश्न पूछने की क्षमता मनुष्य के भीतर है। यही मानव चेतना की विशिष्ट पहचान है।
कार्यक्रम में न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव, सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया शशि प्रकाश सिंह, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया शिव कुमार पाल, अपर महाधिवक्ता एम.सी. चतुर्वेदी, शासकीय अधिवक्ता पतंजलि मिश्रा, मुख्य स्थायी अधिवक्ता शीतल, कार्तिकेय शुक्ल सहित वरिष्ठ विधि अधिकारियों, पदाधिकारियों और अधिवक्ताओं की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. मृत्युंजय राव परमार ने किया। कार्यक्रम के क्यूरेटर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता समीर श्रीवास्तव रहे। संवाद के बाद प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने एआई, मानव चेतना, आध्यात्मिकता और तकनीक के भविष्य से जुड़े सवाल पूछे।
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हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल

