मेडिकल कालेज को सुपुर्द हुआ डॉ. उदय प्रताप सिंह का शव, 2012 में देहदान का लिया था संकल्प
मृत्यु के बाद भी चिकित्सा शिक्षा और समाज की सेवा का संकल्प, मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में परिजनों ने सौंपा पार्थिव शरीर
प्रयागराज, 29 अगस्त (हि.स.)। मृत्यु के बाद भी मानवता और चिकित्सा शिक्षा की सेवा जारी रखी जा सकती है। इसी भावना को चरितार्थ करते हुए स्वर्गीय डॉ. उदय प्रताप सिंह के निधन के बाद उनके परिवार ने उनका पार्थिव शरीर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान के लिए मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग को दान किया। यह देहदान अभियान का 112वां देहदान रहा। डॉ. सिंह ने स्वयं भी वर्ष 2012 में देहदान का संकल्प लिया था। उस समय क्षेत्र में देहदान के प्रति जागरूकता काफी सीमित थी।
स्वर्गीय डॉ. उदय प्रताप सिंह का जन्म 18 अगस्त 1947 को हुआ था। उन्होंने वर्ष 1968 में मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और एसएन चिल्ड्रंस अस्पताल, प्रयागराज से डीसीएच किया। उन्होंने उत्तर प्रदेश राज्य चिकित्सा स्वास्थ्य सेवाओं में लंबे समय तक चिकित्सा और प्रशासनिक दायित्व निभाए। बाद में जॉइंट डायरेक्टर, स्वास्थ्य के पद से सेवानिवृत्त हुए। चिकित्सा सेवा के साथ वह टेनिस के उत्साही खिलाड़ी और खेलप्रेमी भी रहे। उनका जीवन सेवा, सक्रियता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना से जुड़ा रहा।
नाजरेथ अस्पताल, प्रयागराज में उपचार के दौरान 28 अगस्त 2026 को कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट से उनका निधन हुआ। इसके बाद उनके परिवार ने उनके वर्षों पुराने संकल्प को पूरा करते हुए पार्थिव शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया।
देहदान के अवसर पर उनके पुत्र डॉ. संजय सिंह ने परिवार की ओर से विशेष दृढ़ता के साथ यह निर्णय लिया। डॉ. संजय सिंह मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभाग में प्रोफेसर हैं। उन्होंने कहा कि चिकित्सक का दायित्व केवल अपने पेशे तक सीमित नहीं होता, बल्कि समाज के प्रति भी उसकी जिम्मेदारी होती है। उन्होंने अपने पिता से प्रेरणा लेते हुए 29 अगस्त 2026 को उन्हें देहदान के लिए मेडिकल कॉलेज में लाया।
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. ए.के. वर्मा, एनाटॉमी विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्ण पाण्डेय सहित चिकित्सकों, शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं ने स्वर्गीय डॉ. उदय प्रताप सिंह के पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक ग्रहण किया। उपस्थित लोगों ने परिवार के इस निर्णय की सराहना करते हुए इसे चिकित्सा शिक्षा और भावी चिकित्सकों के लिए महत्वपूर्ण योगदान बताया।
वर्ष 2012 में डॉ. सिंह द्वारा लिया गया देहदान का संकल्प अब उनके निधन के बाद साकार हुआ है। इससे यह संदेश मिलता है कि देहदान के माध्यम से मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा की जा सकती है। चिकित्सा शिक्षा के लिए देहदान से विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना का व्यावहारिक अध्ययन करने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।
इस अवसर पर यह संदेश भी सामने आया कि चिकित्सक परिवारों द्वारा देहदान के लिए आगे आना समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा दे सकता है। स्वर्गीय डॉ. उदय प्रताप सिंह और उनके परिवार ने देहदान के माध्यम से चिकित्सा शिक्षा तथा समाज के प्रति सेवा और जिम्मेदारी की अनुकरणीय मिसाल कायम की है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल

