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ग्रियर्सन से सीखना चाहिए दस्तावेजीकरण की पद्धति : प्रो. पृथ्वीराज सिंह

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ग्रियर्सन से सीखना चाहिए दस्तावेजीकरण की पद्धति : प्रो. पृथ्वीराज सिंह


ग्रियर्सन से सीखना चाहिए दस्तावेजीकरण की पद्धति : प्रो. पृथ्वीराज सिंह


‘जॉर्ज ग्रियर्सन और तुलसीदास’ विषय पर राजभाषा संवाद में भाषा सर्वेक्षण और शोध परंपरा पर हुई चर्चा

प्रयागराज, 29 सितंबर (हि.स.)। भारतीयों को भाषा और साहित्य के दस्तावेजीकरण की पद्धति जॉर्ज ग्रियर्सन से सीखनी चाहिए। यह बातें मंगलवार को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजभाषा अनुभाग की ओर से हिंदी पखवाड़ा के अंतर्गत हिंदी विभाग के धीरेंद्र वर्मा सभागार में ‘जॉर्ज ग्रियर्सन और तुलसीदास’ विषय पर राजभाषा संवाद कार्यक्रम में जयप्रकाश विश्वविद्यालय छपरा के पूर्व प्राध्यापक प्रो. पृथ्वीराज सिंह ने कहीं।

उन्होंने कहा कि आधुनिक भारतीय भाषा सर्वेक्षण के प्रमुख भाषा वैज्ञानिक जॉर्ज ग्रियर्सन ने अपने समय में भारतीय भाषाओं और साहित्य के संबंध में महत्वपूर्ण शोध कार्य किया। उनका बहुत सा काम अभी भी हिंदी में अनूदित होना बाकी है। उन्होंने कहा कि ग्रियर्सन ने तुलसीदास की रचनाओं के विभिन्न पाठों का भी गंभीर अध्ययन किया था।

मुख्य वक्ता प्रो. पृथ्वीराज सिंह ने कहा कि भारतीय पुरावशेष में ग्रियर्सन के ‘तुलसीदास के नोट्स’ प्रकाशित हुए हैं। ग्रियर्सन ने तुलसीदास के अध्ययन के लिए अपने समय में उपलब्ध 19 पुस्तकों को आधार बनाया और तुलसीदास पर छह महत्वपूर्ण नोट्स लिखे।

उन्होंने बताया कि तुलसीदास पर ग्रियर्सन ने अपना पहला नोट एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल में प्रस्तुत किया था। ग्रियर्सन के अनुसार तुलसीदास की रचनाओं में क्षेत्र के अनुसार पाठ का अंतर दिखाई देता है। उन्होंने ‘दोहावली’ को लेकर भी यह आशंका व्यक्त की थी कि यह तुलसीदास की मौलिक रचना न होकर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उनके दोहों का संकलन हो सकती है। प्रो. सिंह ने कहा कि ग्रियर्सन का मानना था कि देसी भाषाओं के अत्यधिक शुद्धीकरण या आधुनिकीकरण से रचनाओं में भाषाई और अर्थ संबंधी त्रुटियां बढ़ सकती हैं।

राजभाषा अनुभाग के संयोजक प्रो. कुमार वीरेंद्र ने शोध परंपरा के महत्व पर प्रकाश डाला। अध्यक्षता हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. भूरेलाल ने की। स्वागत एवं विषय प्रवर्तन डॉ. बृजेश पांडेय ने किया। उन्होंने कहा कि ग्रियर्सन ने भाषा सर्वेक्षण के माध्यम से हिंदी साहित्य के अध्ययन को नई दिशा दी। संचालन डॉ. दीनानाथ मौर्य तथा आभार ज्ञापन डॉ. गाजुला राजू ने किया। कार्यक्रम में डॉ. शैलेन्द्र सिंह, हितेश सिंह, अनिल रंजन भौमिक, प्रो. शिवप्रसाद शुक्ल, डॉ. जनार्दन, डॉ. शिवकुमार यादव, डॉ. वीरेंद्र कुमार मीणा, डॉ. अमृता, डॉ. अमरजीत राम सहित शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

हिंदी का भविष्य और भविष्य की हिंदी’ विषय पर राजभाषा संवाद, 30 से अधिक विद्यार्थियों ने लिया भागइंटरनेट और बदलते वैश्विक परिवेश में हिंदी के सामने मौजूद चुनौतियों और उसके भविष्य पर विद्यार्थियों ने खुलकर अपने विचार रखे। विद्यार्थियों ने हिंदी के बदलते स्वरूप, तकनीकी विकास और वैश्विक स्तर पर भाषा के विस्तार को लेकर अपने विचार साझा किए।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजभाषा अनुभाग की ओर से खाद्य प्रौद्योगिकी केंद्र में ‘हिंदी का भविष्य और भविष्य की हिंदी’ विषय पर राजभाषा संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम के प्रारंभ में इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज की निदेशक प्रो. नीलम यादव ने प्रतिभागियों का स्वागत किया। इसके बाद विश्वविद्यालय के कुलगीत का गायन हुआ।

संवाद में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों और महाविद्यालयों के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। 30 से अधिक छात्र-छात्राओं ने अपने विचार प्रस्तुत किए। विद्यार्थियों ने कहा कि इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के साथ हिंदी के प्रयोग का दायरा भी तेजी से बढ़ रहा है। साथ ही भाषा के सामने शुद्धता, तकनीकी शब्दावली और बदलती भाषायी प्रवृत्तियों जैसी चुनौतियां भी हैं।

कार्यक्रम पूर्वाह्न 11 बजे से अपराह्न दो बजे तक चला। संचालन इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज की गुंजन वार्ष्णेय ने किया। मूलचंद्र कुशवाहा ने समीक्षक की भूमिका निभाई। अंत में राजभाषा अनुभाग के हरिओम ने सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार जताया।

तार्किक चिंतन प्रतियोगिता में शिक्षकों और कर्मचारियों ने परखी अपनी क्षमता

जेके इंस्टीट्यूट में राजभाषा अनुभाग की ओर से आयोजित प्रतियोगिता में 30 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जेके इंस्टीट्यूट में आयोजित तार्किक चिंतन प्रतियोगिता में शिक्षकों और कर्मचारियों ने समस्यामूलक प्रश्नों को हल कर अपनी तार्किक क्षमता का प्रदर्शन किया।

प्रतियोगिता का उद्देश्य कर्मचारियों में तार्किक सोच और समस्या समाधान की क्षमता को बढ़ावा देना रहा।

राजभाषा अनुभाग की ओर से आयोजित प्रतियोगिता में विश्वविद्यालय के तीन शिक्षकों और 27 कर्मचारियों समेत कुल 30 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों को विभिन्न समस्यामूलक प्रश्न दिए गए, जिन्हें उन्होंने निर्धारित समय में हल किया।

प्रतियोगिता विभागाध्यक्ष प्रो. राजीव कुमार श्रीवास्तव की अध्यक्षता और डॉ. नीलेश आनंद की देखरेख में आयोजित हुई। प्रो. रजनीश कुमार श्रीवास्तव, डॉ. एसके झा और डॉ. वंदना राठौर ने संयोजक की भूमिका निभाई। प्रतियोगिता के माध्यम से प्रतिभागियों को तार्किक ढंग से समस्याओं का विश्लेषण करने और उनके समाधान तक पहुंचने का अवसर मिला।

कार्यक्रम के अंत में हिंदी अनुवादक हरिओम कुमार ने सभी प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया।

हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल