प्रशासक बने प्रधानों का मानदेय बंद, प्रधान संघ में नाराजगी
- जिलाध्यक्ष बोले- जिम्मेदारी वही तो मानदेय रोकना क्यों, सरकार से भुगतान की मांग
मीरजापुर, 07 अक्टूबर (हि.स.)। ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पूरा होने के बाद प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे ग्राम प्रधानों को मानदेय नहीं मिलने से प्रधान संघ में नाराजगी है। प्रधान संघ का कहना है कि निर्वाचित रहते हुए पांच हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय पाने वाले प्रधानों से प्रशासक के तौर पर पंचायत का काम तो लिया जा रहा है, लेकिन मानदेय रोक दिया गया है। संघ ने सरकार से प्रशासक अवधि का मानदेय देने की मांग की है।
प्रदेश में ग्राम पंचायतों का पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद नए चुनाव होने तक मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया है। बताया जा रहा है कि करीब 58 हजार प्रधान इस व्यवस्था के तहत पंचायतों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। प्रधान संघ के अनुसार पंचायतों के दैनिक कामकाज और ग्रामीण विकास से जुड़े दायित्वों में उनकी भूमिका बनी हुई है।
पंचायती राज विभाग के अधिकारियों के अनुसार प्रशासक निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं होते, बल्कि शासन की व्यवस्था के तहत नामित किए जाते हैं। पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों के तहत प्रशासक के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीमित या समाप्त हो जाते हैं। इसी वजह से निर्वाचित प्रधानों को मिलने वाला मानदेय प्रशासक के रूप में लागू नहीं है। शासन का तर्क है कि मानदेय मद में बचने वाली राशि ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों में खर्च की जाएगी।
मानदेय रोकने का असर केवल ग्राम प्रधानों तक सीमित नहीं है। प्रशासक व्यवस्था लागू होने के बाद ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष को भी मानदेय नहीं दिया जा रहा है। शासन की ओर से इसे प्रशासक व्यवस्था के तहत वित्तीय प्रावधानों से जोड़ा गया है।
प्रधान संघ के जिलाध्यक्ष चंद्र शेखर यादव ने कहा कि प्रधानों से प्रशासक के रूप में पंचायत की जिम्मेदारी लगातार ली जा रही है। ऐसे में मानदेय रोकना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास के नाम पर प्रधानों का हक छीना जा रहा है। उन्होंने सरकार से प्रशासक अवधि का मानदेय जारी करने की मांग की।
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हिन्दुस्थान समाचार / गिरजा शंकर मिश्रा

