अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाना ही वास्तविक धर्म : डॉ. भूपेश गोयल
गोरखपुर, 18 अगस्त (हि.स.)। महाराणा प्रताप महाविद्यालय जंगल धूसड़, गोरखपुर में राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि की स्मृति में आयोजित सप्तदिवसीय व्याख्यानमाला का मंगलवार को भव्य शुभारंभ हुआ। उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, गोरखपुर के कुलपति लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. भूपेश कुमार गोयल ने कर्म, स्वीकार्यता, समर्पण और कृतज्ञता को सफल एवं सार्थक जीवन के महत्वपूर्ण आधार बताते हुए विद्यार्थियों को अपने दायित्वों के प्रति सजग रहने का संदेश दिया।
अपने संबोधन में डाॅ. बघेल ने कहा कि कर्म ही धर्म है का अर्थ केवल कार्य करना नहीं, बल्कि अपने दायित्व का ईमानदारी, निष्ठा और निरंतरता के साथ निर्वहन करना है। विद्यार्थी के लिए अध्ययन, शिक्षक के लिए शिक्षण और समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाना ही वास्तविक धर्म है। उन्होंने कहा कि कर्म की श्रेष्ठता केवल उसके परिणाम से नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित निष्ठा और समर्पण से निर्धारित होती है।
उन्होंने कहा कि जीवन में स्वीकार्यता और समर्पण अत्यंत आवश्यक है। परिस्थितियों को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि वास्तविकता को समझकर उससे आगे बढ़ने की क्षमता है। जब स्वीकार्यता के साथ व्यक्ति अपने लक्ष्य और दायित्व के प्रति स्वयं को समर्पित करता है, तभी साधारण प्रयास असाधारण उपलब्धि का रूप लेते हैं। डॉ. गोयल ने कृतज्ञता को जीवन की महत्वपूर्ण मानवीय भावना बताते हुए कहा कि यह व्यक्ति को अहंकार से बाहर निकालती है। उन्होंने विद्यार्थियों को स्मरण कराया कि किसी भी सफलता के पीछे परिवार, शिक्षक, समाज, प्रकृति तथा अनेक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोगियों की भूमिका होती है। इसलिए उपलब्धियों के साथ कृतज्ञता का भाव बनाए रखना आवश्यक है।
शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल सूचनाओं का हस्तांतरण नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया है। विद्यार्थी में प्रश्न करने की जिज्ञासा और शिक्षक में दिशा देने का धैर्य जब साथ आते हैं, तभी शिक्षा सार्थक होती है। शिक्षक का प्रभाव कक्षा की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका आचरण विद्यार्थी के व्यक्तित्व निर्माण में एक मौन पाठ की तरह कार्य करता है।
संस्कारयुक्त शिक्षा से ही विकसित होगा आदर्श व्यक्तित्व : डॉ. मनीष
समारोह की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. मनीष कुमार त्रिपाठी ने कहा कि महाविद्यालय अपनी स्थापना काल से ही प्रतिवर्ष व्याख्यानमाला के माध्यम से विद्यार्थियों को ज्ञान, संस्कार और राष्ट्रबोध से जोड़ने का प्रयास करता रहा है। उन्होंने कहा कि इस व्याख्यानमाला का उद्देश्य गोरक्षपीठ की गौरवशाली परंपरा और उसके महान संतों के जीवन-दर्शन से प्रेरणा लेकर अपने दायित्वों का बोध कराना है। डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद का मूल उद्देश्य शिक्षा के साथ विद्यार्थियों में संस्कारों का विकास करना है। संस्थापकों के उद्देश्यों और आदर्शों को योजनाबद्ध ढंग से आगे बढ़ाते हुए भारतीय सनातन संस्कृति के मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ विद्यार्थियों में संस्कारयुक्त शिक्षा और आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण किया जा सकता है।
इससे पूर्व मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. भूपेश कुमार गोयल ने महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. मनीष कुमार त्रिपाठी के साथ मां सरस्वती, मां भारती एवं राष्ट्रसंत महंत अवेद्यनाथ जी महाराज के चित्रों पर पुष्पार्चन एवं दीप प्रज्ज्वलित कर सप्तदिवसीय व्याख्यानमाला का औपचारिक उद्घाटन किया। व्याख्यानमाला की प्रस्ताविकी मनोविज्ञान विभाग की सहायक आचार्य अर्चिता राय ने प्रस्तुत की। उद्घाटन सत्र का संचालन प्राचीन इतिहास विभाग के प्रभारी डॉ. सुबोध कुमार मिश्रा ने किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के समस्त शिक्षक, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

