home page

लखनऊ : गोमती पुस्तक महोत्सव में गूंजी अंतरिक्ष में उड़ान की कहानी

 | 
लखनऊ : गोमती पुस्तक महोत्सव में गूंजी अंतरिक्ष में उड़ान की कहानी


ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का हुआ लोकार्पण, विद्यार्थियों से साझा किए अंतरिक्ष यात्रा के अनुभव

लखनऊ, 15 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत की ओर से आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव में मंगलवार को ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला के साथ विशेष संवाद सत्र ‘धरती से अंतरिक्ष तक सपनों की उड़ान’ आयोजित किया गया। इस अवसर पर उनकी अंग्रेजी पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का लोकार्पण उन्होंने अपने परिजनों के साथ संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने वीडियो संदेश से शुभांशु शुक्ला की पुस्तक और उनकी अंतरिक्ष यात्रा की सराहना करते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं।

विद्यार्थियों से साझा किए अंतरिक्ष यात्रा के अनुभव

पुस्तक के लोकार्पण के बाद शुभांशु शुक्ला ने छात्र-छात्राओं से संवाद किया और अपने बचपन, शिक्षा, भारतीय वायुसेना में सेवा, प्रशिक्षण तथा अंतरिक्ष तक पहुंचने की पूरी यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने के बाद इंसान की सोच और नजरिया पूरी तरह बदल जाता है।

उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष से न कोई देश दिखाई देता है, न कोई शहर और न ही कोई क्षेत्रीय सीमा। वहां से केवल एक सुंदर और एकीकृत पृथ्वी दिखाई देती है। उन्होंने विद्यार्थियों को समझाते हुए कहा कि यदि अंतरिक्ष में कोई एलियन उनसे पूछे कि वे कहां से आए हैं और वे अपने शहर या देश का नाम बताएं, तो शायद वह उसे न समझ पाए। लेकिन यदि वे कहें कि वे पृथ्वी से आए हैं, तो वह बात तुरंत समझ में आ जाएगी। अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने पर यह एहसास होता है कि धरती पर खींची गई सीमाएं कितनी छोटी हैं और हम सभी एक ही ग्रह के निवासी हैं।

शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष यात्रा के शुरुआती क्षणों को याद करते हुए कहा कि जब वह पहली बार अंतरिक्ष की ओर रवाना हुए तो उनके मन में उत्साह के साथ एक तरह का डर भी था। उन्होंने उस स्थिति की तुलना परीक्षा कक्ष से की। जिस तरह परीक्षा शुरू होने से पहले कई बार सब कुछ जानते हुए भी कुछ क्षणों के लिए दिमाग खाली-सा हो जाता है, वैसा ही अनुभव उन्हें भी हुआ। हालांकि, उन्होंने खुद को संभाला और मानसिक रूप से मजबूत होकर मिशन पर आगे बढ़े।

अंतरिक्ष की परिस्थितियों ने सिखाए नए अनुभव

अंतरिक्ष में रहने के दौरान शरीर और दैनिक जीवन में कई तरह के बदलाव महसूस होते हैं। सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण के कारण शरीर की लंबाई कुछ बढ़ सकती है और पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर धीरे-धीरे अपनी सामान्य स्थिति में वापस आता है। वहां उठने-बैठने और चलने-फिरने का तरीका भी पृथ्वी से बिल्कुल अलग होता है।

उन्होंने बताया कि यदि अंतरिक्ष में पानी गिराया जाए तो वह पृथ्वी की तरह नीचे नहीं गिरता, बल्कि छोटी-छोटी गोल बूंदों के रूप में तैरता रहता है। यही परिस्थितियां अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। शुभांशु शुक्ला ने बताया कि अपने मिशन के दौरान उन्होंने कई प्रयोग किए, जिनके माध्यम से सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण का मानव शरीर और आसपास के वातावरण पर प्रभाव समझने का प्रयास किया गया।

लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने से मांसपेशियों पर भी असर पड़ता है। पृथ्वी की तरह शरीर को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध काम नहीं करना पड़ता, इसलिए मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। इसी कारण अंतरिक्ष यात्रियों को नियमित व्यायाम करना पड़ता है। अंतरिक्ष यान के भीतर हवा, तापमान और पर्यावरण को भी नियंत्रित परिस्थितियों में रखा जाता है।

पृथ्वी पर लौटने के बाद शरीर को दोबारा गुरुत्वाकर्षण के अनुकूल होने में समय लगता है। शुरुआत में चलना, बैठना और यहां तक कि लेटना भी असहज लग सकता है। शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लौटना भी उनके लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत अनुभव रहा।

युवाओं के सपनों को दी उड़ान

शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को लगातार नई ऊंचाइयों तक ले जा रहा है। देश गगनयान मिशन की तैयारी कर रहा है और भविष्य में चंद्रमा पर भारतीय मानव मिशन की दिशा में भी आगे बढ़ने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि यह सपना केवल कुछ वैज्ञानिकों या अंतरिक्ष यात्रियों का नहीं, बल्कि पूरे देश का सपना है।

उन्होंने लखनऊ के युवाओं का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि इसी शहर का युवा भी अंतरिक्ष यात्री बन सकता है। इसके लिए निरंतर मेहनत, अनुशासन, समर्पण और मानसिक मजबूती जरूरी है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प तभी पूरा होगा, जब देश का प्रत्येक युवा अपनी जिम्मेदारी समझे और अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी से योगदान दे।

राकेश शर्मा के प्रसिद्ध संदेश ‘सारे जहां से अच्छा’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज भारत को अंतरिक्ष से दुनिया के सामने एक नई दृष्टि से प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी की है। अंतरिक्ष से पृथ्वी की सुंदरता, शहरों की रोशनी, हिमालय और सीमाओं से परे एक साझा दुनिया दिखाई देती है। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि हम सभी एक ही ग्रह का हिस्सा हैं।

लखनऊ से शुरू हुई यात्रा

अपने जीवन की कहानी बताते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा कि उनके विद्यालय के दिनों का लखनऊ आज के लखनऊ से काफी अलग था। उस समय सुविधाएं सीमित थीं और अक्सर बिजली भी चली जाती थी। ऐसे माहौल में अंतरिक्ष तक पहुंचने का सपना देखना आसान नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्होंने भी कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे, लेकिन बड़े सपने और लगातार मेहनत ने असंभव लगने वाले लक्ष्य को संभव बना दिया।

उन्होंने कहा कि आज के युवाओं के पास शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक सुविधाएं हैं। जरूरत केवल इन संसाधनों का सही उपयोग करने और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि अंतरिक्ष यात्री भी आम इंसानों की तरह ही होते हैं। उनमें कोई जादुई शक्ति नहीं होती। अंतर केवल उनकी सोच, सपनों और उन्हें पूरा करने की दृढ़ता में होता है।

वर्ष 2019 बना जीवन का निर्णायक मोड़

शुभांशु शुक्ला ने बताया कि वर्ष 2019 उनके जीवन का बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव था। उस समय वह बेंगलुरु में थे, जब उन्हें अपने चयन का संदेश मिला। उन्होंने बताया कि संदेश मिलने के बाद वह कुछ देर तक अपनी गाड़ी के पास खड़े रहे और उस खुशी को महसूस करते रहे। सबसे पहले उन्होंने यह खबर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ साझा की। परिवार की खुशी ने उन्हें एहसास कराया कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की है।

भारतीय वायुसेना में सेवा के दौरान मिले अनुभवों को याद करते हुए उन्होंने अपनी पत्नी कामना के योगदान को भी विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हर चुनौतीपूर्ण दौर में परिवार का सहयोग और विश्वास उनकी ताकत बना। उन्होंने युवाओं से कहा कि किसी भी व्यक्ति की सफलता के पीछे परिवार, मित्र, शिक्षक और सहयोगियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए सफलता के साथ उन लोगों का सम्मान करना भी जरूरी है, जिन्होंने यात्रा में साथ दिया।

अंत में शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में कोई भी सपना असंभव नहीं है। जरूरत है कि लक्ष्य बड़ा हो, मेहनत ईमानदार हो और प्रयास लगातार जारी रहे। उन्होंने कहा, “बड़ा सपना देखने से मत डरिए। कई बार जो सपना असंभव लगता है, वही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है।” उन्होंने युवाओं से देश के विकास में योगदान देने और भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया।

हिन्दुस्थान समाचार / मोहित वर्मा