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विधान सभा में पेश हुई संभल हिंसा की जांच रिपोर्ट, सुनियाेजित साजिश में कई नेताओं की भूमिका

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विधान सभा में पेश हुई संभल हिंसा की जांच रिपोर्ट, सुनियाेजित साजिश में कई नेताओं की भूमिका


-पथराव, गोलीबारी और आगजनी में चार लोगों की मौत हुई थी

-आयोग ने कहा, मृतकों को लगी गोलियां पुलिस की नहीं थीं

-हिंसा में 28 पुलिसकर्मी घायल हुए, सात को गोली लगी

-उपद्रवियों ने पुलिस के हथियार और सामान लूटने की भी कोशिश की

-आयोग ने जिला प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई को प्रभावी और संयमित बताया

लखनऊ , 05 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग ने संभल हिंसा को पूर्व नियोजित साजिश बताते हुए कई नेताओं और मस्जिद प्रबंधन से जुड़े पदाधिकारियों की भूमिका का उल्लेख किया है। रिपोर्ट के अनुसार इस हिंसा में चारों मृतकों की मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई। सर्वे को लेकर मुस्लिम समुदाय में गलत जानकारी फैलाई गई और 24 नवंबर 2024 को मस्जिद के बाहर बड़ी भीड़ जुटी, फिर हिंसा भड़क गई। आयोग ने पुलिस कार्रवाई को प्रभावी बताते हुए भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए सुझाव भी दिए हैं। यह रिपोर्ट आज विधानसभा के पटल पर रखी गयी है।

न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि संभल स्थित शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान 24 नवंबर 2024 को हुई हिंसा पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम थी। भीड़ को भड़काने, गलत जानकारी फैलाने और हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार करने में संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल और जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के पदाधिकारियों की भूमिका रही। ये लाेग अपना राजनीतिक प्रभुत्व बनाए रखने के लिए यह सब किया कराया है।

आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 19 नवंबर को अधूरा सर्वे होने के बाद से ही माहौल को तनावपूर्ण बनाने की तैयारी शुरू हो गई थी। आरोपिताें ने मुस्लिम समुदाय के बीच यह भ्रम फैलाया कि सर्वे के बहाने मस्जिद पर कब्जा करने या उसे ध्वस्त करने की कोशिश की जा रही है जबकि अदालत के आदेश में केवल प्राचीन स्मारक अधिनियम के तहत रखरखाव और आम जनता के प्रवेश से जुड़े बिंदुओं पर ही विचार किया जाना था। आयाेग की रिपोर्ट में कहा गया है कि 24 नवंबर की सुबह बड़ी संख्या में लोग मस्जिद के आसपास एकत्र हो गए। इसके बाद नारेबाजी, पथराव, गोलीबारी और आगजनी की घटनाएं हुईं। भीड़ में शामिल कई लोगों ने अपने चेहरे ढके हुए थे। आयोग ने जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के सदर जफर अली, सचिव मशहूद अली फारूकी और कमेटी के अन्य पदाधिकारियों की भूमिका का भी उल्लेख किया है। जांच रिपाेर्ट में ऐसे तत्वाें का विस्तार से उल्लेख किया गया है। साथ ही गिरफ्तार लाेगाें के बयान के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है।

पुलिस की गोली से नहीं हुई थी मौत

हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। आयोग ने पोस्टमार्टम और बैलिस्टिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि इन चाराें लाेगाें की मौत पुलिस की गोलियों से नहीं हुई थी। मृतकों के परिजनों ने भी अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कराए थे। रिपोर्ट के मुताबिक हिंसा में 28 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें सात को गोली लगी। एसपी संभल समेत कई वरिष्ठ अधिकारी भी घायल हुए। उपद्रवियों ने पुलिस के हथियार और अन्य सामान लूटने का भी प्रयास किया।

पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई प्रभावी

आयोग ने जिला प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई को प्रभावी और नियमानुसार बताते हुए कहा कि पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती, बैरिकेडिंग और संयमित कार्रवाई के कारण हिंसा को व्यापक सांप्रदायिक दंगे में बदलने से रोक लिया गया। इतना ही नहीं संवेदनशीलता काे देखते हुए पुलिस ने घातक हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया, जिससे प्रदेश में बड़े स्तर पर तनाव फैलने की आशंका टल गई।

पुरानी घटनाओं का भी जिक्र

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में संभल के सांप्रदायिक हिंसा के इतिहास का भी विस्तार से उल्लेख किया है, जिसमें भारी जन हानि हुई थी। आयोग ने कहा कि शहर पहले भी कई बार सांप्रदायिक हिंसा का गवाह रहा है, जिसमें 1978 का दंगा सबसे अधिक विनाशकारी था। आयोग ने अपनी रिपाेर्ट में भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कई सुझाव देते हुए कहा कि अदालत के आदेशों का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है और भीड़ के माध्यम से कानून को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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हिन्दुस्थान समाचार / शिव सिंह