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भरत चरित्र त्याग, कर्तव्य और भ्रातृ प्रेम की अद्भुत मिसाल : पं. नीरजानन्द शास्त्री

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भरत चरित्र त्याग, कर्तव्य और भ्रातृ प्रेम की अद्भुत मिसाल : पं. नीरजानन्द शास्त्री


- श्रीराम कथा में वन गमन और भरत चरित्र का किया भावपूर्ण वर्णन

- कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु, केवट प्रसंग ने बांधा समां

मीरजापुर, 28 मई (हि.स.)। जमालपुर क्षेत्र के पसही गांव स्थित काली माता मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा के छठे दिन गुरुवार को कथा व्यास पं. नीरजानन्द शास्त्री ने राम वन गमन और भरत चरित्र का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा सुन श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

कथा व्यास ने कहा कि भरत चरित्र भारतीय संस्कृति में त्याग, कर्तव्य और भ्रातृ प्रेम की अनुपम मिसाल है। उन्होंने बताया कि अयोध्या नरेश राजा दशरथ, रानी कैकेयी को दिए गए वरदानों के कारण भरत को राजसिंहासन और भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास देना पड़ा। पिता के वचनों की रक्षा के लिए भगवान श्रीराम ने सहर्ष राजपाट त्याग कर माता सीता और लक्ष्मण के साथ वनगमन किया।

उन्होंने कहा कि जब भरत ननिहाल से लौटे और उन्हें पूरी घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने राजसिंहासन स्वीकार करने से इनकार कर दिया। भरत, माताओं, मंत्रियों और अयोध्यावासियों के साथ भगवान श्रीराम को वापस लाने के लिए चित्रकूट तक पैदल पहुंचे। वहां उन्होंने श्रीराम के चरणों में गिरकर अयोध्या लौटने की विनती की, लेकिन श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन करने की बात कहकर लौटने से मना कर दिया। इसके बाद भरत श्रीराम की पादुका लेकर अयोध्या लौट आए और उन्हें सिंहासन पर स्थापित कर सेवक भाव से राज्य का संचालन किया।

पं. नीरजानन्द शास्त्री ने कहा कि त्रेता युग में भाई, भाई की विपत्ति का बंटवारा करता था, जबकि आज लोग संपत्ति के बंटवारे को लेकर आपस में संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने लोगों से परिवार और समाज में प्रेम एवं त्याग की भावना अपनाने का आह्वान किया।

कथा के दौरान गंगा तट पर भगवान श्रीराम और केवट संवाद का प्रसंग सुनाकर कथा व्यास ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने बताया कि केवट ने भगवान से कहा कि जैसे वह उन्हें गंगा पार करा रहा है, वैसे ही भगवान उसे भवसागर से पार लगाएं। भक्त और भगवान के इस संवाद को सुनकर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो उठे।

हिन्दुस्थान समाचार / गिरजा शंकर मिश्रा