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सेलरी, बोनस और ओवरटाइम की मांग ही नहीं और कई कारण है श्रमिकों के उग्र आंदोलन के

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सेलरी, बोनस और ओवरटाइम की मांग ही नहीं और कई कारण है श्रमिकों के उग्र आंदोलन के


नोएडा, 13 अप्रैल (हि.स.)। नोएडा में श्रमिकों का चल रहा उग्र प्रदर्शन लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या यह श्रमिकों का काफी दिनों से गुस्से का गुबार फटा है या कोई असामाजिक तत्व इन्हें हवा दे रहा है। नोएडा में सोमवार को मजदूरों के हिंसक प्रदर्शन से हालात बिगड़ गए। दिल्ली की सीमाओं पर भारी जाम लग गया। नेशनल हाईवे 9 और अन्य रास्तों पर गाड़ियों की लंबी कतारें लग गईं और लोग घंटों फंसे रहे। नोएडा सेक्टर-62 में प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए, कई वाहनों में आग भी लगा दी गई और पुलिस पर पथराव किया। सेक्टर 84 से भी ऐसे की प्रदर्शनों की खबरें आईं। नोएडा फेज-2 और सेक्टर 60 के इलाकों में पत्थरबाजी हुई। यूपी पुलिस ने अफवाह फैलाने वाले दो सोशल मीडिया हेंडल्स पर कार्रवाई की है। पुलिस ने चेतावनी दी है कि कानून तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी।

यह उग्र प्रदर्शन क्यों हो रहा है इसको लेकर जब प्रदर्शन कर रहे हैं लोगों से बात की गई तो कुछ का कहना था कि कंपनियों में उनकी नियुक्ति सीधी नहीं होती है। कुछ कंपनियों ने ठेकेदारों को हायर कर रखा है। अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग ठेकेदार हैं। वे अपने हिसाब से मजदूरों को रखते हैं और पैसे देते हैं। एक महिला ने कहा कि वह दिन में 12 घंटे काम करती है। ठेकेदार उसको महीने के 13 हजार रुपये देता है।

एक श्रमिक का कहना था कि ठेकेदारों के तहत काम पर लगने से उनका काफी नुकसान होता है। उनका ना तो पीएफ कटता है और ना ही उनको ईएसआईसी के तहत इलाज की सुविधा मिलती है। यही नहीं कई बार तो ऐसा होता है कि यदि कोई कर्मचारी बीमार पड़ जाता है या किसी काम से गांव चला जाता है तो उसकी जगह तुरंत दूसरे को नौकरी पर रख लिया जाता है।

मजदूरों का कहना है कि यदि किसी को बीच में गांव जाना पड़ा तो ठेकेदार उसकी मजदूरी का हिसाब भी नहीं करता है। नोएडा में मजदूरों और ठेकेदारों के बीच अक्सर झगड़े विवाद की खबरें आती रहती हैं। एक ने कहा कि कुछ कंपनियां सीधी भर्ती देने या सीधे काम पर रखने से इसलिए भी कतराती हैं कि उनको तय मानकों के मुताबिक भुगतान करना होगा। कंपनियों को सीधे कर्मचारियों को रखना चाहिए।

मजदूरों की मानें तो नोएडा में दो प्रकार के कर्मचारी हैं। कुछ कंपनियां जो कर्मचारियों को सीधे काम पर रखती हैं, उनको वीकली ऑफ मिलता है। ऐसे कर्मचारियों का पीएफ कटता है। ऐसे कर्मचारियों का हेल्थ इंश्योरेंस भी होता है। उनको सीएल और एमएल के साथ ईएल की सुविधा भी मिलती है लेकिन जिन कर्मचारियों को ठेकेदार काम देता है उन अनधिकृत कर्मचारियों को ये सुविधाएं नहीं मिलती हैं। मजदूरों के असंतोष की एक बड़ी वजह यह भी है।

अनधिकृत कर्मचारियों का कहना है कि यदि किसी वजह से एक दिन भी काम छूट जाता है तो उस दिन की सेलरी कट जाती है। कपड़े का काम करने वाली कंपनियों में धागा काटने वाले कर्मियों की स्थितियां बड़ी खराब हैं। एक महिला कर्मचारी ने बताया कि धागा काटने वाले कर्मचारियों को तो ठेकेदार की ओर से केवल 10 हजार रुपये महीने के मिलते हैं। इनको पीएफ और इएसआईसी की सुविधा भी नहीं मिलती है। यही नहीं साफ सफाई के काम करने वालों की स्थितियां दयनीय हैं। कुछ कर्मचारी जो गार्ड का काम करते हैं उनके हालात और भी खराब हैं। किसी साथी के बीमार होने पर उनको डबल डबल ड्यूटी तक देनी पड़ जाती है।

कुछ ने कहा कि सरकारें न्यूनतम मजदूरी पर फैसला तो कर देती हैं लेकिन जमीन पर ये पूरी तरह लागू नहीं हो पाते हैं। मजदूरों का कहना है कि कुछ कंपनियां लागू करती हैं लेकिन अनधिकृत कर्मचारी इससे वंचित ही रहते हैं। सरकारों और प्रशासन को न्यूनतम मजदूरी का फैसला जमीन पर लागू कराना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता है।

मजदूरों को किराए के मकान में रहना पड़ता है। एक कमरे में तीन या चार लोग रहते हैं। मकान मालिक भी उसी हिसाब से किराया भी वसूलता है। हर साल किराया बढ़ जाता है लेकिन सेलरी उस हिसाब से नहीं बढ़ती है। कुछ कंपनियां साल में 280 रुपये तो कुछ 300 रुपये सेलरी बढ़ाती हैं। हमारे घर का किराया दिवाली पर 500 बढ़ जाता है।

कई मजदूरों ने कहा कि बेहद कम लोग ही रेगुलर बेसिस पर रखे जाते हैं। ऐसे कर्मचारियों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता लेकिन समान काम करने वाले अनियमित कर्मचारियों की हालत खराब ही रहती है। बीमार होने या हादसे की स्थितियों में इनको सही इलाज तक नहीं मिल पाता है। एक महिला मजदूर ने कहा कि 08 घंटे काम करने के लिए बाकियों की तरह हमें भी 20 हजार रुपये मिलने चाहिए।

कुछ ने कहा कि गांव में मजदूरी का काम करने वाले को एक दिन में 500 रुपये की दिहाड़ी मिल जाती है। इस तरह वह महीने का 15 हजार तक कमा लेता है फिर हमें 13 हजार सेलरी किस हिसाब से दी जाती है। कुछ का कहना है कि बोनस देने के नाम पर कंपनियां दिवाली गिफ्ट देती हैं। इनमें लंच बॉक्स, कैपर, डिनर सेट जैसी चीजें ठेकेदार देकर काम चलाते हैं।

कुछ कर्मचारियों ने कहा कि यदि वे ओवर टाइम ना करें तो नोएडा जैसे शहर में गुजार नामुमकिन है। ओवर टाइम भी सरकारी मानकों के अनुरूप नहीं दिया जाता है। कुछ ने कहा कि उनकी पत्नियां भी काम पर जाती हैं तब जाकर किसी तरह गुजारा हो पाता है। कुछ श्रमिकों का यह भी कहना है कि गैस की कालाबाजारी के चलते उनका बजट काफी गड़बड़ा गया है, वे लोग खाना भी अपने घर पर नहीं बना पा रहे हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुरेश चौधरी