गीता और रामचरितमानस का अध्ययन कर स्वयं के साथ करें राष्ट्र निर्माण : डॉ. उमेश पालीवाल
कानपुर, 19 अगस्त (हि.स.)। राष्ट्र निर्माण के लिए सबसे पहले स्वयं का निर्माण जरूरी है। इसके लिए युवाओं और भावी पीढ़ी को श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र से प्रेरणा लेकर गीता और रामचरितमानस का अध्ययन करना चाहिए और उनके संदेशों को जीवन में उतारना चाहिए। यह बातें बुधवार को श्रीमद्भगवद्गीता वैदिक न्यास के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उमेश पालीवाल ने छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में आयोजित 14वें गोस्वामी तुलसीदास जयंती समारोह के दौरान कहीं।
श्रीमद्भगवद्गीता वैदिक न्यास द्वारा पोषित एवं संचालित श्रीमद्भगवद्गीता एवं वैदिक वाङ्गमय शोधपीठ, छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) और सनातन सेवा सत्संग समिति उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को श्रावण शुक्ल सप्तमी के अवसर पर गोस्वामी तुलसीदास जयंती समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित गोस्वामी तुलसीदास की प्रतिमा का पंचोपचार पूजन और अभिषेक किया गया।
वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई सभागार में आयोजित समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इसके बाद गणेश वंदना, श्रीमद्भगवद्गीता के 12वें अध्याय का पाठ और विनय पत्रिका का गायन किया गया। विद्यार्थियों ने गोस्वामी तुलसीदास के जीवन पर आधारित लघु नाटिका का मंचन भी किया।
समारोह में ‘राष्ट्र उत्थान में श्रीमद्भगवद्गीता एवं श्रीरामचरितमानस की भूमिका’ विषय पर संगोष्ठी हुई। मुख्य वक्ता पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी, मुंबई के महामंडलेश्वर स्वामी चिदम्बरानंद सरस्वती ने तुलसीदास के जीवन चरित्र और भगवान श्रीराम के आदर्शों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सामाजिक बुराइयों को समाप्त कर समन्वयकारी और सभ्य समाज की स्थापना करना वर्तमान समय की आवश्यकता है।
रामकृष्ण मिशन कानपुर के सचिव स्वामी नरेश्वरानंद ने कहा कि गीता को जीवन में उतारने के लिए निरहंकारी होना आवश्यक है। उन्होंने गीता को कर्मयोग की शिक्षा देने वाला ग्रंथ बताते हुए फल की इच्छा के बिना कर्म करने की भावना पर विस्तार से चर्चा की।
दिव्य प्रेम सेवा मिशन हरिद्वार के अध्यक्ष डॉ. आशीष गौतम ने कहा कि तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में तत्कालीन परिस्थितियों और श्रीराम के जीवन चरित्र को समन्वित रूप में प्रस्तुत किया है। मानस में समाज, परिवार और राजधर्म की आदर्श परिकल्पना का मार्गदर्शन मिलता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय पाठक ने कहा कि विश्वविद्यालय में श्रीमद्भगवद्गीता पर शोध कार्य शोधपीठ के माध्यम से किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के चरित्र को शब्दों का स्वरूप देने वाले गोस्वामी तुलसीदास की प्रतिमा विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित होना गौरव की बात है।
डॉ. उमेश पालीवाल ने न्यास की ओर से पिछले पांच वर्षों में किए गए कार्यों की जानकारी दी। सनातन सेवा सत्संग मंडल के अध्यक्ष सुधीर भाई मिश्र ने बताया कि समिति पिछले 13 वर्षों से तुलसी जयंती सहित विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों को सनातन परंपरा के अनुरूप आयोजित करती आ रही है। न्यास के केंद्रीय सचिव एवं महामंत्री परमानंद शुक्ला ने कहा कि श्रीरामचरितमानस और श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है।
संगोष्ठी का संचालन डॉ. बीना उदय सिंह और शोधपीठ के अनिल गुप्ता ने किया। न्यास को सहयोग प्रदान करने के लिए डॉ. अरुण दीक्षित और अन्नू अवस्थी को सम्मानित किया गया। इसके बाद योगेश तिवारी की टीम ने संगीतमय सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ कराया। सामूहिक आरती और भंडारे में प्रसाद वितरण के साथ समारोह का समापन हुआ।
इस अवसर पर डॉ. वंदना पाठक, बलराम नरूला, मुकेश पालीवाल, राजीव महाना, डॉ. रोचना विश्नोई, उमेश निगम, प्रेमचंद्र अग्निहोत्री, भूपेश अवस्थी, डॉ. ओम प्रकाश आनंद, वीरेंद्र मूरझानी, सचिन शुक्ला, राजेंद्र अवस्थी, डॉ. यूसी सिन्हा, केके शुक्ला, अशोक तिवारी, अखिलेश शुक्ला, अमरनाथ, डॉ. योगेंद्र, सरला देवी, विजय पंडित, पवन तिवारी, रामू मिश्रा, सुधीर शुक्ला, मनोज भदौरिया, विवि के मीडिया प्रभारी डॉ. दिवाकर अवस्थी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

