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शीघ्र प्रकाशित होगी आशुतोष मिश्र की पुस्तक “कराहती धरती, बेचैन मनुष्य”

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शीघ्र प्रकाशित होगी आशुतोष मिश्र की पुस्तक “कराहती धरती, बेचैन मनुष्य”


गोरखपुर, 16 मई (हि.स.)। पर्यावरणीय संकट, सामाजिक संवेदना, भारतीय समाज के बदलते ताने-बाने और युवा पीढ़ी की दिशा संबंधी चिंताओं को केंद्र में रखकर लिखी गई लेखक एवं पत्रकार आशुतोष मिश्र की पुस्तक “कराहती धरती, बेचैन मनुष्य” शीघ्र ही पाठकों के समक्ष आने वाली है। लगभग ढाई सौ पृष्ठों की यह पुस्तक केवल पर्यावरण पर आधारित रचना नहीं, बल्कि धरती, समाज, मनुष्य और युवा चेतना से संवाद करती एक गंभीर वैचारिक यात्रा है।

लेखक आशुतोष मिश्र ने बताया कि जब विकास के नाम पर धरती की छाती पर घाव उभरने लगते हैं, नदियाँ अपनी ही धारा में सिसकने लगती हैं, जंगलों की हरियाली मौन होकर मनुष्य से प्रश्न करने लगती है और समाज की संवेदनाएं भीड़ के शोर में दबने लगती हैं, तब कलम का मौन रहना संभव नहीं होता। इन्हीं प्रश्नों, पीड़ाओं और आत्ममंथन से इस पुस्तक का जन्म हुआ है।

वरिष्ठ पत्रकार आनंद सिंह ने कहा कि पुस्तक “कराहती धरती, बेचैन मनुष्य” पाठकों के हाथों में आने वाली एक ऐसी कृति है, जो केवल पर्यावरणीय संकट की चर्चा नहीं करती, बल्कि उसके बहाने भारतीय समाज की आंतरिक बेचैनी, सामाजिक ताने-बाने, रोजगार की चुनौतियों और नौजवानों की चिंता को भी अत्यंत गंभीरता से सामने लाती है। उन्होंने कहा कि पाठकों ने पर्यावरण विषयक कई पुस्तकें पढ़ी होंगी, लेकिन यह पुस्तक केवल पर्यावरण पर केंद्रित नहीं है। पर्यावरण इसका एक प्रबल पक्ष अवश्य है, किंतु इसके साथ-साथ इसमें सामाजिक सरोकार, बेरोजगारी, युवाओं की दिशा, जीवन के ध्येय और समाधानपरक चिंतन को भी विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।

आनंद सिंह ने कहा कि यदि कोई यह समझता है कि यह पुस्तक केवल पर्यावरण के खतरे को लेकर लिखी गई है, तो यह अधूरी समझ होगी। दरअसल यह पुस्तक पर्यावरण के साथ-साथ भारतीय समाज की संरचना, उसकी चुनौतियों और मनुष्य की बदलती संवेदनाओं को भी इंगित करती है। यह पुस्तक वस्तुतः हर समस्या के समाधान की दिशा में पाठक से संवाद करती है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में एक ओर पर्यावरण को हो रहे नुकसान के बारे में लिखा गया है, वहीं दूसरी ओर देश के नौजवान बेरोजगारी से कैसे जूझें, सरकारी अथवा निजी क्षेत्र में नौकरी प्राप्त करने के लिए कौन से प्रयास करें और जीवन में अपने लक्ष्य को कैसे पहचानें—इन बिंदुओं पर भी सलीके से विचार किया गया है।

श्री सिंह ने कहा कि लंबे समय तक हिंदी पत्रकारिता से जुड़े रहने वाले आशुतोष मिश्र ने दुनिया और समाज को बहुत करीब से देखा है। एक केमिकल इंजीनियर होने के साथ-साथ एक संवेदनशील इंसान के रूप में उन्होंने अपने आसपास घटने वाली घटनाओं, सामाजिक बदलावों और मानवीय पीड़ाओं को गंभीरता से महसूस किया और उन्हें शब्दों में ढाला है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक उन सभी ज्ञान-पिपासुओं की जिज्ञासा को संतुष्ट करने में सक्षम है, जो केवल घटनाओं को देखना नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे कारणों को समझना चाहते हैं। जो लोग पर्यावरण के रोजमर्रा के खतरों से भयभीत हैं, उनके लिए यह पुस्तक अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली वैचारिक मशाल साबित हो सकती है।

आनंद सिंह ने आगे कहा कि यह पुस्तक उन नौजवानों के लिए टॉनिक का काम करेगी, जिन्हें यह नहीं पता कि उन्हें अपने जीवन में करना क्या है, उनका ध्येय क्या है और उन्हें किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इस पुस्तक में जीवन के उद्देश्य, आत्मनिर्माण और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषयों को बेहद सरल, स्पष्ट और सलीकेदार ढंग से समझाया गया है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

आनंद सिंह ने कहा कि “कराहती धरती, बेचैन मनुष्य” समस्याओं का रोना नहीं रोती, बल्कि समाधान का मार्ग दिखाती है। यही कारण है कि यह पुस्तक केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि समाज, पर्यावरण और युवा पीढ़ी के लिए एक जागरण-पत्र के रूप में देखी जा सकती है।

लेखक आशुतोष मिश्र ने अपने शुभचिंतकों, वरिष्ठजनों, मित्रों और पाठकों से इस प्रथम साहित्यिक यात्रा के लिए स्नेह, आशीर्वाद और मार्गदर्शन की अपेक्षा व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने, आत्ममंथन करने और जीवन को नई दृष्टि से देखने के लिए लिखी गई है।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय