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माता का स्थान पिता से दस गुना बड़ा : रामभद्राचार्य

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लखनऊ, 08 जून (हि.स.)। पद्मविभूषण तुलसीपीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य महाराज ने नौ दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा के अष्टम दिवस भगवान श्रीराम के वनवास काल के दौरान आदिवासियों, गिरिवासियों तथा शबरी से मिलन के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने ऋषि शरभंग प्रसंग का उल्लेख करते हुए नवधा भक्ति के छठे स्वरूप वंदन भक्ति की विस्तृत व्याख्या की।

सीतापुर रोड स्थित बृज की रसोई परिसर में चल रही कथा में रामभद्राचार्य ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रेम वासनात्मक नहीं, बल्कि उपासनात्मक होता है। उन्होंने कहा कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम ने वन से पुष्प चुनकर स्फटिक शिला पर माता सीता का श्रृंगार किया था। यह भारतीय दाम्पत्य जीवन में सम्मान, समर्पण और प्रेम का आदर्श उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि दाम्पत्य जीवन परस्पर सम्मान और मर्यादा पर आधारित होना चाहिए। पत्नी पति को आदरपूर्वक आप कहती है किंतु पति द्वारा पत्नी के प्रति अनादरपूर्ण संबोधन भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं माना गया है।

रामभद्राचार्य ने कहा कि महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने के लिए लाए गए नारी शक्ति वंदन प्रस्ताव का भी विरोध हुआ था। भारतीय संस्कृति के अनुसार महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण भी दिया जाए तो कम है। मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि माता का स्थान पिता से दस गुना बड़ा माना गया है। परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका सर्वोपरि है।

मीडिया प्रभारी डा. एस.के.गोपाल ने बताया कि श्रीराम कथा के समापन दिवस की कथा मंगलवार को प्रातः नौ बजे आरंभ होगी तथा दोपहर में विशाल भंडारे के साथ कार्यक्रम का समापन होगा। समापन अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कथा श्रवण कर व्यासपीठ का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन