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फिल्म का संदेश दर्शकों तक स्पष्ट पहुंचना जरूरी : डॉ. विनय कुमार

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फिल्म का संदेश दर्शकों तक स्पष्ट पहुंचना जरूरी : डॉ. विनय कुमार


कानपुर, 17 सितंबर (हि.स.)। फिल्म बनाते समय कैमरा एंगल, एडिटिंग और अन्य तकनीकी पहलुओं के साथ यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जिस विषय पर फिल्म बनाई जा रही है, उसका संदेश दर्शकों तक स्पष्ट रूप से पहुंचे। विद्यार्थियों को तकनीकी कमियों पर काम करते हुए अपनी रचनात्मकता को और निखारना चाहिए। यह बातें गुरुवार को छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के डॉ. विनय कुमार ने विद्यार्थियों की शॉर्ट फिल्मों की स्क्रीनिंग के दौरान कही।

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में विद्यार्थियों द्वारा तैयार की गई 16 शॉर्ट फिल्मों की स्क्रीनिंग हुई। फिल्मों में पर्यावरण, नागरिक कर्तव्य, महिला सम्मान, परिवार प्रबंधन और व्यक्तित्व विकास जैसे विषयों को शामिल किया गया। विद्यार्थियों ने दहेज प्रथा, एंगर मैनेजमेंट, निर्णय क्षमता, परिवार में समानता, परिवार का महत्व, प्रदूषण के प्रति जागरूकता और प्लास्टिक मुक्ति जैसे मुद्दों को रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया।

फिल्मों के मूल्यांकन के लिए निर्णायक मंडल में जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के निदेशक डॉ. उपेंद्र पांडेय, फाइन आर्ट्स विभाग के डॉ. सुंदर पाल और पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के डॉ. विनय कुमार शामिल रहे। मूल्यांकन विषय चयन, रचनात्मकता, अभिनय, निर्देशन, तकनीकी पक्ष, प्रस्तुतीकरण और संदेश की प्रभावशीलता के आधार पर किया गया।

डॉ. सुंदर पाल ने कहा कि फिल्म निर्माण के दौरान सामने आने वाली कमियों को पहचानना और उनसे सीखना विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। डॉ. उपेंद्र पांडेय ने कहा कि विद्यार्थियों को निर्माण क्षमता के साथ निर्णय क्षमता विकसित करने पर भी ध्यान देना चाहिए, ताकि वे अपने कार्य की कमियों का स्वयं आकलन कर सकें।

प्रतियोगिता में प्रथम स्थान ‘चाइल्ड इज़ वॉचिंग’ ने हासिल किया। इसके निर्देशक पुष्कर पाठक हैं। द्वितीय स्थान दीपक श्रीवास्तव की निर्देशित फिल्म ‘10 सेकंड्स’ और तृतीय स्थान अश्विनी कुमार सिंह की निर्देशित ‘द रिलेशनशिप बिहाइंड स्क्रीन’ को मिला। प्रथम स्थान प्राप्त फिल्म में नशे की हालत में एक व्यक्ति को उसके बच्चे की नजर से दिखाते हुए बड़ों के व्यवहार का बच्चों पर पड़ने वाला प्रभाव बताया गया। ‘10 सेकंड्स’ में मनोवैज्ञानिक विषय को कैमरा एंगल और फ्रेमिंग के जरिए प्रस्तुत किया गया, जबकि ‘द रिलेशनशिप बिहाइंड द स्क्रीन’ में मोबाइल और स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल से वास्तविक रिश्तों से दूरी का मुद्दा उठाया गया।

विभागाध्यक्ष डॉ. दिवाकर अवस्थी ने कहा कि ऐसी गतिविधियों से विद्यार्थियों को कल्पना और विचारों को अभिव्यक्त करने के साथ मीडिया के व्यावहारिक पक्ष को समझने का अवसर मिलता है। फिल्म निर्माण के दौरान विषय चयन, कहानी, शूटिंग, अभिनय, कैमरा संचालन और संपादन जैसे विभिन्न पक्षों पर काम करने से रचनात्मक सोच, टीमवर्क और तकनीकी दक्षता विकसित होती है।

प्रतियोगिता विद्यार्थियों के लिए कक्षा में सीखी मीडिया अवधारणाओं को व्यवहार में उतारने का माध्यम बनी। कार्यक्रम में प्रो. कौशल त्रिपाठी, डॉ. ओम शंकर गुप्ता, डॉ. जितेंद्र डबराल, डॉ. योगेंद्र पांडेय, डॉ. रश्मि गौतम, डॉ. होईमावती तालुकदार, डॉ. हरिओम, सागर कनौजिया, प्रेमकिशोर शुक्ला सहित शिक्षक और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप