गीता-स्वाध्याय के साथ गूंजा मम स्थाने संस्कृतम् का उद्घोष
आत्मानन्द संस्कृत शिक्षण संस्थान में बटुकों ने किया गीता पाठ
सीतापुर, 25 अगस्त (हि.स.)। नैमिष क्षेत्र स्थित आत्मानन्द संस्कृत शिक्षण संस्थान में संस्कृतभारती, सीतापुर के तत्वावधान में चल रहे संस्कृत सप्ताह के अन्तर्गत मंगलवार को श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ एवं स्वाध्याय का विशेष सत्र आयोजित हुआ। इस अवसर पर बटुकों में संस्कृत भाषा एवं भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रति गहरा उत्साह देखने को मिला।
गीता-पाठ से बटुकों में जागृत हुआ संस्कार-बोध
संस्कृत भारती की कार्यकर्ता अंशु गुप्ता के मार्गदर्शन में बटुकों ने सामूहिक रूप से गीता के चुनिन्दा श्लोकों का शुद्ध उच्चारण सहित पाठ किया। प्रत्येक श्लोक के पश्चात उसका सरल अर्थ भी समझाया गया, जिससे बच्चे न केवल श्लोक कण्ठस्थ कर सकें, अपितु उनमें निहित जीवन-दर्शन को भी आत्मसात कर सकें। स्वाध्याय सत्र में बटुकों को स्वयं श्लोक पढ़ने, समझने तथा आपस में चर्चा करने का अवसर भी दिया गया।
मम स्थाने संस्कृतम् — दैनिक जीवन में संस्कृत का संकल्प
कार्यक्रम के दौरान अंशु गुप्ता ने संस्कृतभारती के ध्येय वाक्य मम स्थाने संस्कृतम् अर्थात मेरे स्थान पर संस्कृत के भाव को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि इस ध्येय वाक्य का उद्देश्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने घर, विद्यालय, कार्यस्थल अथवा जिस भी स्थान पर रहे, वहाँ दैनिक व्यवहार में संस्कृत भाषा का प्रयोग करे। यह केवल भाषा सीखने का आन्दोलन नहीं, अपितु संस्कृत को पुनः जन-जन की बोलचाल की भाषा बनाने का संकल्प है।
गीता जीवन जीने की कला
शिक्षण संस्थान के संस्थापक आचार्य सर्वेश शुक्ल ने बटुकों को आशीर्वचन देते हुए कहा कि गीता केवल एक धर्मग्रन्थ नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवन जीने की कला सिखाने वाला महान ग्रन्थ है। बाल्यकाल में गीता का स्वाध्याय बच्चों के चरित्र-निर्माण एवं संस्कार-सिंचन में अत्यन्त सहायक सिद्ध होता है। उन्होंने कहा कि नैमिषारण्य जैसी ऋषि-मुनियों की पावन तपोभूमि, जहाँ स्वयं महर्षियों ने अठारह पुराणों की रचना की थी, वहाँ गीता-पाठ का आयोजन अत्यन्त सार्थक एवं प्रेरणादायी है।
मंगलाचरण के साथ सत्र का समापन, आगे भी जारी रहेगा अभियान
कार्यक्रम के अन्त में सभी बटुकों ने एक स्वर में गीता के मंगलाचरण श्लोक का सामूहिक पाठ करते हुए सत्र का समापन किया। संस्कृत सप्ताह के अन्तर्गत आगामी दिनों में भी संस्कृत सम्भाषण, श्लोकोच्चारण, भाषा-क्रीड़ा तथा अन्य ज्ञानवर्धक गतिविधियों के माध्यम से बटुकों को संस्कृत भाषा एवं भारतीय संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।
हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन

