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संस्कृत मंचन से सजी सांस्कृतिक शाम: ‘दूतवाक्यं’ ने मोहा दर्शकों का मन

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संस्कृत मंचन से सजी सांस्कृतिक शाम: ‘दूतवाक्यं’ ने मोहा दर्शकों का मन


-कपीश्वर वैदिक गुरुकुल में 'दूतवाक्यं' का मंचन-संस्कृत नाट्य कला से बच्चों ने मोहा मन-संस्कृत केवल मंत्रों की नहीं, अपितु मंच और संवाद की भी भाषा है-संस्कृत केवल भाषा नहीं संस्कार है

लखनऊ, 20 मार्च (हि.स.)। गुलाला घाट स्थित कपीश्वर वैदिक गुरुकुल के प्रांगण में अद्भुत दृश्य देखने को मिला, जहां प्राचीन भारतीय संस्कृति की संवाहक 'संस्कृत भाषा' केवल मंत्रों तक सीमित न रहकर मंच पर अभिनय के माध्यम से जीवंत हो उठी। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान एवं प्रांजल आर्ट्स एन्ड डेवलपमेंट सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 15 दिवसीय संस्कृत नाट्य कार्यशाला का समापन महाकवि भास रचित कालजयी नाटक 'दूतवाक्यं' के सफल मंचन के साथ हुआ।

15 दिनों के कठोर प्रशिक्षण का दिखा प्रभाव

यह नाट्य प्रस्तुति पिछले 15 दिनों से निरंतर चल रही कार्यशाला का परिणाम थी। इस दौरान बच्चों को केवल अभिनय ही नहीं, बल्कि संस्कृत संभाषण, संवाद अदायगी, मंच संचालन और व्यक्तित्व विकास का गहन प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला का निर्देशन भारतेन्दु नाट्य अकादमी के पूर्व छात्र रमन कुमार के मार्गदर्शन में रंगकर्मी आलोक कुमार शुक्ल 'तुमुल' द्वारा किया गया, जबकि बच्चों को संस्कृत के कठिन उच्चारणों और बारीकियों से प्रशिक्षक अंशु गुप्ता ने अवगत कराया।

संस्कृत केवल भाषा नहीं, संस्कार है

कार्यक्रम का आयोजन लेटे हनुमान मंदिर के मुख्य सेवादास एवं गुरुकुल के संरक्षक डॉ. विवेक तांगड़ी के सान्निध्य में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित चिन्मय मिशन के स्वामी कौशिक चैतन्य जी महाराज ने कहा, संस्कृत विश्व की सबसे परिष्कृत भाषा है। अभिनय के माध्यम से इसका प्रचार-प्रसार युवाओं में आत्मविश्वास और सांस्कृतिक गौरव का संचार करता है।

पीसीएफ के महाप्रबंधक डॉ. चन्द्रभूषण त्रिपाठी ने बच्चों के कौशल की प्रशंसा करते हुए इसे आधुनिक युग में पुरातन विधा का पुनर्जागरण बताया। संस्थान के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी दिनेश मिश्र ने संस्कृत के व्यावहारिक पक्ष पर बल दिया।

इस अवसर पर सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक आर. के. सिंह ने संस्कृत को अनुशासन और संयम की भाषा बताते हुए कहा कि आज के युग में जहाँ नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, वहाँ बच्चों का इस कठिन भाषा में संवाद करना समाज में एक नई चेतना जागृत करेगा। वहीं, माध्यमिक शिक्षा की सेवानिवृत्त अपर निदेशक ललिता प्रदीप ने शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य पर बल देते हुए कहा कि नाटक और संस्कृत का यह मेल न केवल बच्चों की भाषा शुद्ध करता है, बल्कि उनमें भारतीय मूल्यों के प्रति गहरा प्रेम भी भरता है।

कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रतिष्ठित लेखक डॉ. शीलवन्त सिंह, समाज कल्याण अधिकारी एवं अभ्युदय योजना के प्रमुख पवन यादव, एवं अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप