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संकीर्तन आत्मा को शुद्ध कर उसे भगवान की प्रेमाभक्ति से जोड़ देता है : चंचलापति दास

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संकीर्तन आत्मा को शुद्ध कर उसे भगवान की प्रेमाभक्ति से जोड़ देता है : चंचलापति दास


संकीर्तन आत्मा को शुद्ध कर उसे भगवान की प्रेमाभक्ति से जोड़ देता है : चंचलापति दास


चंद्रोदय मंदिर में महाभिषेक, संकीर्तन और पुष्प होली का अलौकिक संगम

मथुरा, 04 मार्च (हि.स.)। ब्रजमंडल की विश्वविख्यात होली के उल्लास के मध्य फाल्गुन पूर्णिमा के पावन दिवस पर श्री चैतन्य महाप्रभु का 540वां प्राकट्य महोत्सव वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर में दिव्य आध्यात्मिक आभा के साथ संपन्न हुआ। प्रातःकाल से ही मंदिर प्रांगण में भक्तों की अविरल धारा प्रवाहित होती रही। नवीन प्रांगण में सुसज्जित फूल बंगला, छप्पन भोग, भव्य पालकी उत्सव, दिव्य महाभिषेक, अखंड हरिनाम संकीर्तन और पुष्पों की होली ने वातावरण को कृष्णमय बना दिया।

महाभिषेक के दिव्य दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। भक्ति-रस से सराबोर वातावरण में “हरि बोल” और “गौर हरि” के जय घोष से सम्पूर्ण परिसर गूंज उठा। देश के विभिन्न नगरों मथुरा, आगरा, लखनऊ, दिल्ली, गुरुग्राम, जयपुर, हरियाणा, ग्वालियर एवं मुरैना से आए भक्तों ने इस अद्भुत आध्यात्मिक उत्सव में सहभागिता की।

इस अवसर पर चंद्रोदय मंदिर के अध्यक्ष चंचलापति दास ने कलियुग में हरिनाम संकीर्तन की महिमा का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने श्रीमद्भागवतम् के द्वादश स्कंध से उद्धृत प्रसिद्ध श्लोक प्रस्तुत किया। चंचलापति दास ने श्लोक का भावार्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि यद्यपि कलियुग समस्त दोषों का भंडार है, तथापि इसमें एक महान गुण निहित है। केवल भगवान श्रीकृष्ण के नाम का संकीर्तन करने मात्र से मनुष्य समस्त सांसारिक आसक्तियों से मुक्त होकर परम धाम को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार एक पराक्रमी राजा असंख्य दस्युओं का विनाश कर देता है, उसी प्रकार हरिनाम संकीर्तन मनुष्य के जीवन में संचित दोषों और पापों का नाश कर देता है। संकीर्तन आत्मा को शुद्ध कर उसे भगवान की प्रेमाभक्ति से जोड़ देता है।

मंदिर परिसर में सुसज्जित फूल बंगले की सुरभि और छप्पन भोग की दिव्य रचना ने भक्तों को अलौकिक अनुभव प्रदान किया। पालकी उत्सव में गौरांग महाप्रभु की मनोहारी झांकी ने सभी को भाव-विभोर कर दिया। पुष्पों की वर्षा के मध्य जब हरिनाम संकीर्तन हुआ, तब ऐसा प्रतीत हुआ मानो सम्पूर्ण ब्रजभूमि स्वयं प्रेम-रस में स्नान कर रही हो। गौर पूर्णिमा का यह महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और समर्पण की जीवंत अभिव्यक्ति बन गया। जहाँ हर हृदय में श्रीकृष्ण चैतन्य का प्रकाश आलोकित होता दिखाई दिया।

हिन्दुस्थान समाचार / महेश कुमार