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प्राचीन काल में अध्ययन के लिए विषय के रूप में विद्यमान थीं 18 विद्यायें : प्रो देवदत्त सरोदे

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प्राचीन काल में अध्ययन के लिए विषय के रूप में विद्यमान थीं 18 विद्यायें : प्रो देवदत्त सरोदे


--इविवि में ऋषि व्याख्यानमाला आयोजित, शोधार्थियों को अंकपत्र व प्रमाणपत्र वितरित

प्रयागराज, 26 फरवरी (हि.स)। प्राच्य भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में गुरूवार को ऋषि व्याख्यानमाला का आयोजन हुआ। इसके साथ ही सत्र 2023-24 के शोधार्थियों को उनकी शोधोपाधि पाठ्यचर्या पूर्ण होने पर अंकपत्र-प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. वी.के. राय ने शोधार्थियों को प्रमाणपत्र प्रदान किया तथा उन्हें उत्तम शोध के लिए प्रेरणा दी।

ऋषि व्याख्यानमाला के अन्तर्गत मुख्य वक्ता केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय गंगानाथ झा परिसर के सह निदेशक आचार्य के रूप में कार्यरत प्रो.देवदत्त सरोदे ने ‘संस्कृत शास्त्रों के अनुसन्धान में समस्या एवं नवीन सम्भावनायें’ विषय पर बताया कि वलभी-गुजरात, कांचीपुरम-तमिलनाडु, मणिखेत-कर्नाटक, शारदा पीठ-गुजरात आदि स्थल प्राचीन शास्त्राध्ययन के केन्द्र रहे हैं। शास्त्र का लक्षण वर्णित करते हुए बताया कि 18 विद्यायें प्राचीन काल में अध्ययन के विषय के रूप में विद्यमान थीं, इसके अतिरिक्त चौसठ कलाओं सहित पांच मूल विद्याएं भी विद्यमान थी। जो शब्द विद्या, हेतु, अध्यात्म, चिकित्सा, शिल्पविद्या के रूप में प्रतिष्ठित थी। भृगुशिल्प शास्त्र में 32 विद्याएं वर्णित हैं।

तत्पश्चात् आचार्य ने संस्कृत के अनुसन्धान में नवीन क्षेत्रों पर चर्चा की। (भारतीय शिल्पशास्त्र विस्तारपट) की जयमंगला टीका में भी 64 कलाओं का वर्णन है। ललित विस्तर ग्रन्थ में भी नैकविध 94 कलाएं वर्णित हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अनुसंधान के चार आयाम हैं - 1-मौलिकानुसन्धान 2-अनुप्रयोगात्मकानुसन्धान 3- प्रयोगात्मकानुसन्धानम् 4-क्रियात्मकानुसन्धान। उन्होंने बताया कि प्राचीन शिक्षा परम्परा-गुरुकुल शिक्षा, दशग्रन्थि परम्परा, अवधान परम्परा, भारतीय विद्याओं के कलाओं का शिक्षण, गोकृषि आधारित स्वावलम्बनात्मक शिक्षण, मनोविज्ञान के क्षेत्र में शरीर विज्ञान का क्षेत्र, इतिहास अभिलेख परम्परा, नक्षत्र विज्ञान का क्षेत्र, पाश्चात्य एवं पौरस्त्य विद्वानों के विचारों पर समीक्षात्मक अनुसन्धान करना इत्यादि नूतन विषयों पर भी छात्रों द्वारा अनुसन्धान होना चाहिए।

संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रोफेसर प्रयाग नारायण मिश्र ने व्याख्यान में शोध छात्रों के लिए उन्नति के मार्ग पर चलने के इस प्रथम सोपान की बधाई दी एवं शुभाशीर्वाद प्रदान किया। उन्होंने बताया कि जो कुछ भी जाना गया है उसे और स्पष्ट करना व नवीन आयाम खोजना यही रिसर्च है। इस रिसर्च का सम्पूर्ण समाज पर प्रभाव परिलक्षित होना चाहिए। उन्होंने इस रिसर्च की तुलना शरीरांगों से करते हुए कहा कि ऐसे ही आपको नवीन आयामों को स्वीकारना है। प्रारम्भ से अन्त तक यह शोधानुसन्धान चलता है। उन्होंने कहा कि अधुना शोध केवल माध्यम हो गया है आजीविका अर्जन हेतु, किन्तु सोशल मीडिया के मकड़जाल से दूर रहकर पुस्तकों से जुड़कर ही शोधछात्र उन्नति कर सकते हैं। परम्परा संस्कृति मूल्यों का अनुप्राणन करने वाली पीढी की आवश्यकता आज है। प्रो. प्रयाग नारायण मिश्र ने कहा कि शोधछात्रों द्वारा अनुसन्धान में नवीन एवं आधुनिक पद्धतियों, सम्भावनाओं एवं विधाओं का प्रयोग करना चाहिए, जिससे शोध की गरिमा में अभिवृद्धि हो सके।

कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र हर्षवर्धन पाण्डेय एवं दीनबंधु यादव ने तथा धन्यवाद ज्ञापन दीक्षा पाण्डेय एवं शान्ति पाठ अंकित पाण्डेय द्वारा किया गया। इस अवसर पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग के आचार्यगण प्रो.अनिल प्रताप गिरि, डॉ निरूपमा त्रिपाठी, डॉ मीनाक्षी जोशी, डॉ तेज प्रकाश, डॉ प्रचेतस्, डॉ भूपेंद्र वालखंडे, डॉ अनिल कुमार, डॉ सतरुद्र प्रकाश, डॉ रेनू कोछड़ शर्मा, डॉ कल्पना कुमारी, डॉ ललित कुमार, रश्मि यादव, डॉ रजनी गोस्वामी, डॉ प्रतिभा आर्या आदि प्राध्यापकगण एवं काफी संख्या में शोध छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र