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जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण ने विकास के द्वार खोले: प्रो अमित सिंह

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जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण ने विकास के द्वार खोले: प्रो अमित सिंह


-भारतीय अस्मिता और गौरव का मुकुट है जम्मू कश्मीर: प्रो. सत्यकाम

-मुक्त विवि में 12 साल बेमिसाल पर व्याख्यान माला का आयोजनप्रयागराज, 16 जून (हि.स)। उत्तर प्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज में केन्द्र सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित व्याख्यानमाला शृंखला के तीसरे दिन मंगलवार को जम्मू-कश्मीर की भू-राजनीति एवं अनुच्छेद 370 विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता प्रोफेसर अमित सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक विशिष्टताओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर केवल एक सीमावर्ती प्रदेश नहीं, बल्कि भारत की सामरिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इकाई है, जिसकी स्थिति दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती रही है। जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के बाद विकास, निवेश, आधारभूत संरचना, पंचायत सशक्तीकरण, रोजगार सृजन, शिक्षा, महिला अधिकारों तथा सामाजिक न्याय के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खुले हैं। उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे राष्ट्रहित, संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता की भावना को सर्वाेपरि रखते हुए भारत के समग्र विकास में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें।प्रो. अमित सिंह ने जम्मू-कश्मीर के ऐतिहासिक घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1947 में हुई तथाकथित कबायली घुसपैठ वस्तुतः कबायली वेश में पाकिस्तान समर्थित सैन्य कार्रवाई थी, जिसका भारतीय सेना ने साहसपूर्वक मुकाबला किया। उन्होंने बताया कि तत्पश्चात तत्कालीन परिस्थितियों में महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए गए और संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान जम्मू-कश्मीर की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद 370 तथा अनुच्छेद 35ए का प्रावधान किया गया।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार द्वारा लिए गए निर्णय के परिणामस्वरूप जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 लागू किया गया तथा अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाते हुए राज्य को अन्य राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों की भाँति संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में लाया गया। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती व्यवस्था के कारण अनेक संवैधानिक एवं सामाजिक जटिलताएं विद्यमान थीं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर की सामरिक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि यह क्षेत्र भारत, पाकिस्तान और चीन से जुड़ी जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों का केन्द्र रहा है। बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा और कूटनीतिक सशक्तता ने भी इस निर्णय के लिए अनुकूल परिस्थितियां निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत्यकाम ने जम्मू-कश्मीर की समृद्ध कश्मीरी संस्कृति का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय एकता, अखण्डता एवं सांस्कृतिक समन्वय की भावना को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कश्मीरियत केवल एक भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि सदियों से विकसित उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, डोगरा, लद्दाखी और कश्मीरी समाज परस्पर सद्भाव, सहअस्तित्व और भाईचारे के साथ जीवन यापन करते आए हैं। भारत की विविधता में एकता की यह परम्परा हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।

कुलपति ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत की भूमि का मात्र एक टुकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और गौरव का मुकुट है। भारत की संस्कृति विभाजन नहीं, बल्कि शांति, संवाद, सह-अस्तित्व और मानवता के मूल्यों में विश्वास करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना सभी नागरिकों को समान अवसर, न्याय और विकास प्रदान करने की है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर को अलगाववाद, उग्रवाद और आतंकवाद जैसी चुनौतियों से मुक्त कर विकास की मुख्यधारा से जोड़ना केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व था। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर में विकास, सुशासन और राष्ट्रीय एकीकरण की नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ है। आज जम्मू-कश्मीर शिक्षा, आधारभूत संरचना, पर्यटन, निवेश और जनकल्याण के क्षेत्रों में नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है।

मुक्त विवि के पीआरओ डॉ. प्रभात चंद्र मिश्र ने बताया कि इसके पूर्व कार्यक्रम के नोडल अधिकारी प्रो. संजय सिंह ने वाचिक स्वागत एवं विषय प्रवर्तन किया। उन्होंने व्याख्यान के विषय की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की।

हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र