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नई तकनीक और नवाचार से खेती में बढ़ रही आय, भीटी हवेली गांव बना मॉडल : जिलाधिकारी

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नई तकनीक और नवाचार से खेती में बढ़ रही आय, भीटी हवेली गांव बना मॉडल : जिलाधिकारी


कानपुर, 23 मार्च (हि.स.)। नई तकनीक और नवाचार को अपनाकर किसान अपनी आय कई गुना बढ़ा सकते हैं, भीटी हवेली इसका बेहतरीन उदाहरण है। यदि पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक पद्धतियों को जोड़ा जाए तो कम जमीन में भी बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ संभव है। यहां के किसान जिस तरह नई तकनीकों को अपना रहे हैं, वह पूरे जनपद के लिए प्रेरणादायक है। यह बातें सोमवार को जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने बिल्हौर तहसील के भीटी हवेली गांव के दौरे के दौरान कहीं।

बिल्हौर तहसील का भीटी हवेली गांव अब खेती के बदलते स्वरूप का जीवंत उदाहरण बनता जा रहा है। यहां खेतों में सिर्फ फसल नहीं, बल्कि नई सोच, नई तकनीक और बढ़ती आय की एक मजबूत कहानी आकार ले रही है। परंपरागत खेती से आगे बढ़ते हुए किसान वैज्ञानिक विधियों से मक्का, सब्जियों और फूलों की खेती कर रहे हैं।

जिलाधिकारी ने गांव का जायजा लेकर उन्नत खेती पद्धतियों को करीब से देखा। इस दौरान उपनिदेशक कृषि आर.एस. वर्मा एवं जिला कृषि अधिकारी प्राची पांडेय भी मौजूद रहीं। खेतों में विकसित मल्टी लेयर फार्मिंग की संरचनाएं और उनमें एक साथ उगती विविध फसलें इस बदलाव की स्पष्ट तस्वीर पेश कर रही थीं।

गांव में कुल 453 कृषक हैं और 225 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि पर खेती की जाती है। इनमें से 375 किसान करीब 175 हेक्टेयर क्षेत्र में जायद मक्का की खेती कर रहे हैं। पारंपरिक फसलों जैसे गेहूं और धान का दायरा सीमित होता जा रहा है, जबकि मक्का, सब्जियों और फूलों की खेती से किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है।

मल्टी लेयर फार्मिंग गांव की नई पहचान बन चुकी है। लगभग 50 हेक्टेयर क्षेत्र में करीब 50 किसान इस तकनीक को अपना रहे हैं, जिसमें एक ही खेत में अलग-अलग स्तरों पर कई फसलें उगाई जाती हैं। जिलाधिकारी ने प्रगतिशील किसान सुनील सिंह कटियार के खेत का अवलोकन किया, जहां एक ही ढांचे में परवल, कुंदरू, बैंगन और फूलों की खेती की जा रही है।

सुनील सिंह कटियार मक्का उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी किसान हैं और उन्हें जनपद में सर्वाधिक उत्पादन के लिए कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। वे आलू की खेती भी करते हैं और कस्टम हायरिंग सेंटर योजना के अंतर्गत 10 लाख रुपये की लागत से कृषि यंत्र स्थापित कर चुके हैं, जिसमें 04 लाख रुपये का अनुदान मिला है।

जिलाधिकारी ने बताया कि इस प्रकार की खेती में प्रति हेक्टेयर वार्षिक लागत लगभग डेढ़ से दो लाख रुपये के बीच आती है, जबकि आय आठ से दस लाख रुपये तक पहुंच रही है, जो पारंपरिक खेती की तुलना में तीन से चार गुना अधिक है।

उन्होंने कृषि विभाग को निर्देशित किया कि प्रगतिशील किसानों के अनुभव अन्य किसानों तक पहुंचाए जाएं और योजनाओं का लाभ हर जरूरतमंद किसान तक सुनिश्चित किया जाए। साथ ही जल संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि अधिक पानी लेने वाली फसलों के स्थान पर मक्का जैसी कम जल वाली फसलों को अपनाना समय की मांग है।

हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप