प्राकृतिक चिकित्सा शरीर की उपचार क्षमता को जागृत करने की समग्र पद्धति : डॉ. वंदना पाठक
कानपुर, 28 सितंबर (हि.स.)। अनियमित जीवनशैली, तनाव, असंतुलित खान-पान और शारीरिक निष्क्रियता के बीच प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ जीवन जीने की दिशा दिखाती है। यह केवल रोग के उपचार तक सीमित नहीं, बल्कि शरीर की प्राकृतिक उपचार क्षमता को जागृत करने और स्वास्थ्य संरक्षण की समग्र पद्धति है। यह बात वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्य डॉ. वंदना पाठक ने सोमवार को छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के योग ओपीडी में गांधी जयंती के उपलक्ष्य में शुरू हुए पांच दिवसीय प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग शिविर में कही।
आयोजित शिविर का उद्देश्य प्राकृतिक चिकित्सा और योग के माध्यम से स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। डॉ. वंदना पाठक ने कहा कि प्राकृतिक चिकित्सा में जल, मिट्टी, सूर्य, वायु और संतुलित आहार जैसे प्राकृतिक तत्वों का विशेष महत्व है। दिनचर्या में प्राकृतिक जीवनशैली, संतुलित आहार, योग, पर्याप्त विश्राम और संयम को शामिल करने से कई स्वास्थ्य समस्याओं की रोकथाम में मदद मिल सकती है।
उन्होंने महात्मा गांधी के प्राकृतिक चिकित्सा संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधी जी ने स्वच्छता, संयम, आत्मअनुशासन और प्रकृति के साथ सामंजस्य को स्वस्थ जीवन का आधार माना था। प्रतिभागियों से प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांतों को दैनिक जीवन में अपनाने का आह्वान किया गया।
शिविर समन्वयक एवं सहायक आचार्य डॉ. सेतवान ने फुट बाथ की प्रक्रिया का प्रायोगिक प्रदर्शन किया। उन्होंने इसकी विधि, सावधानियों और स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगिता समझाई। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक चिकित्सा की प्रक्रियाओं का उचित विधि और विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में प्रयोग स्वास्थ्य संवर्धन तथा शरीर को विश्राम देने में सहायक हो सकता है।
योग ओपीडी प्रभारी डॉ. राम किशोर ने ‘गांधी जी को योग का जनक क्यों कहा जाता है’ विषय पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि गांधी जी का जीवन सत्य, अहिंसा, संयम, आत्मअनुशासन और नियमित जीवन जैसे योग के मूल सिद्धांतों का उदाहरण था। उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा में गांधी जी द्वारा बताए गए ‘छठे तत्व—राम नाम’ की अवधारणा को भी समझाया।
सहायक आचार्य डॉ. मनीष कुमार ने गांधी दर्शन की वर्तमान प्रासंगिकता पर विचार रखे। उन्होंने सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन, स्वच्छता, सादगी और संयम को आज भी महत्वपूर्ण बताया। सह आचार्य डॉ. प्रभाकर पांडे ने नियमित शारीरिक गतिविधि, व्यायाम और सक्रिय जीवनशैली को स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी बताया। योग शिक्षिका सोनाली धनवानी और शोध छात्र अनिल कुमार यादव ने भी विचार रखे।
कार्यक्रम के अंत में शारीरिक शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. श्रवण कुमार यादव ने अतिथियों, शिक्षकों, शोधार्थियों, छात्र-छात्राओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार जताया। शिविर में विश्वविद्यालय के शोधार्थियों, पंजीकृत छात्र-छात्राओं और रोगियों ने सहभागिता की। पांच दिवसीय शिविर में योग और प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े विभिन्न व्यावहारिक पहलुओं की जानकारी दी जा रही है।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

