चंबल मिशन में मल्लाह समाज के योगदान को इतिहास में उचित स्थान देने की उठी मांग
चंबल मिशन में गरजे वक्ता, मल्लाह समाज के योगदान को इतिहास में उचित स्थान देने की उठी मांग
ओरैया, 03 मई (हि. स.)। उत्तर प्रदेश इटावा जनपद में रविवार काे आयोजित चंबल फाउंडेशन के चंबल मिशन अभियान के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में वक्ताओं ने स्वतंत्रता संग्राम के उपेक्षित नायकों के इतिहास को सामने लाने की जोरदार मांग उठाई। इस दौरान विशेष रूप से मल्लाह समाज के ऐतिहासिक योगदान को प्रमुखता से रेखांकित किया गया और कहा गया कि इनके बलिदान को अब तक इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला है।
वक्ताओं ने कहा कि चंबल और कुवारी नदियों के दोआब में स्थित बंसरी गांव कभी क्रांतिकारियों की राजधानी हुआ करता था। यह क्षेत्र परिहार ठाकुरों की बसावट के कारण परिहारा क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता रहा है। 1857 की क्रांति के दौरान बंसरी गांव ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में अहम भूमिका निभाई। यह गांव भरेह रियासत के अंतर्गत आता था, जिसमें कुल 54 गांव शामिल थे। यहां के राजा रूप सिंह सेंगर ने 31 मई 1857 को अपनी रियासत को अंग्रेजों से स्वतंत्र घोषित कर दिया था और 1857 से 1859 तक अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ कई निर्णायक युद्ध लड़े।
इतिहासकार देवेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि चंबल अंचल के क्रांतिकारी यह मानते थे कि भीषण गर्मी में अंग्रेजी सेना स्थानीय परिस्थितियों में टिक नहीं पाएगी, और इसी रणनीति के तहत उन्होंने संघर्ष को आगे बढ़ाया। बंसरी गांव क्रांतिकारी सेनाओं का प्रमुख पड़ाव था और यहां का प्रत्येक व्यक्ति—चाहे पुरुष हो या महिला—अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सक्रिय रूप से शामिल था।
इस पूरे आंदोलन में मल्लाह समाज की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। वक्ताओं ने कहा कि मल्लाहों ने न केवल क्रांतिकारियों को नदी मार्ग से सुरक्षित आवागमन कराया, बल्कि अंग्रेजी सैनिकों के खिलाफ निर्णायक भूमिका निभाते हुए कई सैनिकों को चंबल नदी में डुबो दिया। हथियारों की कमी के बावजूद उन्होंने अपने साहस, कौशल और स्थानीय भौगोलिक ज्ञान का उपयोग कर क्रांतिकारियों को बढ़त दिलाई। इसके बावजूद उनके योगदान को इतिहास में भुला दिया गया।
वक्ताओं ने बताया कि आजादी से पूर्व क्षेत्र में अत्यधिक गरीबी थी, फिर भी बंसरी के लोग खुद भूखे रहकर कालपी-आगरा मार्ग से गुजरने वाले क्रांतिकारियों को भोजन कराते थे। अंग्रेजों द्वारा बंसरी पर अक्टूबर 1858 में हमला किया गया, जिसमें कई लोग मारे गए और कई को बंदी बनाकर काला पानी की सजा दी गई। दुर्जन सिंह, कस्तूरी सिंह और शिव बक्स सिंह को 5 से 8 वर्ष तक की कठोर सजा दी गई थी।
डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि चंबल घाटी के लोग इतने साहसी थे कि जो चल सकता था, वह अंग्रेजों से लड़ने के लिए तैयार रहता था। उन्होंने कहा कि मल्लाह समाज, बघेल समाज और अन्य वर्गों के योगदान को जानबूझकर इतिहास से अलग रखा गया। क्रांतिकारियों के लिए हथियार बनाने वाले लोहारों तक को अंग्रेजों ने दंडित किया, लेकिन उनका जिक्र कहीं नहीं मिलता।
वक्ताओं ने जीता चमार, जंगली-मंगली भंगी, मारून सिंह लोधी जैसे क्रांतिकारियों के नाम लेते हुए कहा कि इन सभी नायकों का इतिहास आज भी दबा हुआ है। स्वतंत्रता के बाद भी इनके योगदान का समुचित अध्ययन नहीं किया गया, जो एक बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है। कार्यक्रम में चंबल शौर्य स्मारक के निर्माण की मांग प्रमुख रूप से उठाई गई। इसमें इन सभी क्रांतिकारियों की प्रतिमाएं, पुस्तकालय, ऑडिटोरियम, लाइट एंड साउंड शो, स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने, ‘चंबल गाथा’ डॉक्यूमेंट्री बनाने और डाक टिकट जारी करने जैसी मांगें शामिल हैं। वक्ताओं ने कहा कि यह जरूरी है ताकि नई पीढ़ी को पता चल सके कि देश की आजादी चंबल के वीरों के बलिदान से संभव हुई थी और मल्लाह समाज सहित सभी उपेक्षित वर्गों को उनका उचित सम्मान मिल सके।
बंसरी में हुई चौपाल में महान क्रांतिकारी दुर्जन सिंह परिहार के वंशज भानु सिंह परिहार, जीता चमार के वंशज बलराम सिंह जाटव, सूरज रेखा त्रिपाठी एडवोकेट, मान सिंह सरपंच, गजेंद्र सिंह एडवोकेट, वैभव रंजन द्विवेदी, कौशल सिंह,विनोद मास्टर, आदिल खान, विवेक सिंह आदि ने सम्बोधित किया।
हिन्दुस्थान समाचार / सुनील कुमार

