एनआईसीयू में 480 ग्राम की नवजात बच्ची ने जीती जिंदगी की जंग, चिल्ड्रेंस मेडिकल सेंटर ने हासिल की राष्ट्रीय स्तर पर बेहद दुर्लभ उपलब्धि
लखनऊ, 17 जुलाई (हि.स.) जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई जब जन्म के साथ ही शुरू हो जाए और उसका योद्धा महज 480 ग्राम वजन की एक नन्ही बच्ची हो, तब हर सांस किसी चमत्कार से कम नहीं होती। लखनऊ के चिल्ड्रेंस मेडिकल सेंटर (सीएमसी), दलीगंज ने ऐसी ही एक असंभव लगने वाली चुनौती को संभव कर दिखाया है। 26 सप्ताह की गर्भावस्था में जन्मी इस अति-गंभीर प्रीमैच्योर बच्ची ने 84 दिन तक नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में जीवन और मौत के बीच संघर्ष किया और आखिरकार अपनी अदम्य जीवटता के साथ चिकित्सकों की अथक मेहनत को नई पहचान दे दी।
जन्म के समय बच्ची का वजन मात्र 480 ग्राम था। उसकी स्थिति बेहद नाजुक थी। सांस लेने में कठिनाई के कारण उसे लंबे समय तक वेंटिलेटर का सहारा देना पड़ा, वहीं उपचार के दौरान रक्त भी चढ़ाना पड़ा। चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ और पूरे एनआईसीयू दल ने चौबीसों घंटे उसकी निगरानी करते हुए हर पल उसकी जिंदगी को बचाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए।
करीब दो महीने 12 दिन तक चले इस संघर्ष के बाद अब बच्ची की हालत स्थिर है। उसका वजन बढ़कर 770 ग्राम हो चुका है। वह बिना किसी अतिरिक्त ऑक्सीजन सहायता के सामान्य वातावरण में सांस ले रही है और हर तीन घंटे में 15 मिलीलीटर दूध भी पी रही है। चिकित्सकों के अनुसार उसके अन्य सभी आवश्यक स्वास्थ्य मानक भी सामान्य हैं, जो उसके स्वस्थ भविष्य की उम्मीद को और मजबूत करते हैं।
चिकित्सकों का दावा है कि उत्तर प्रदेश में अब तक इतने कम वजन के साथ जीवित रहकर स्वस्थ होने की दिशा में बढ़ने वाला यह पहला नवजात मामला है। इस उपलब्धि के साथ 685 ग्राम वजन वाले पूर्व रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर भी इतनी कम वजन वाली प्रीमैच्योर बच्ची का सफल उपचार बेहद दुर्लभ उपलब्धियों में गिना जाता है।
चिल्ड्रेंस मेडिकल सेंटर के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. आशुतोष वर्मा ने शुक्रवार काे पत्रकार वार्ता कर बताया कि यह सफलता मेडिकल सेंटर की पूरी चिकित्सा टीम के समर्पण, धैर्य और आधुनिक नवजात चिकित्सा सुविधाओं का परिणाम है। उन्होंने कहा कि वेंटिलेटर से रूम ऑक्सीजन तक का सफर, हर ग्राम वजन की बढ़ोतरी और बच्ची की हर सामान्य होती धड़कन टीम के लिए किसी बड़ी जीत से कम नहीं रही।
यह सफलता केवल चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धि भर नहीं, बल्कि इस बात का भी प्रमाण है कि समय पर विशेषज्ञ उपचार, आधुनिक तकनीक और चिकित्सकों की प्रतिबद्धता मिल जाए तो उम्मीद की सबसे छोटी किरण भी जीवन का सबसे बड़ा उजाला बन सकती है। 480 ग्राम की यह नन्ही बच्ची आज उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद, हौसले और विश्वास की नई मिसाल बन गई है, जो कठिन परिस्थितियों में भी जीवन से हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुनते हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

