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(संशाेधित) खिरकिया माता मंदिर में पिंडी के रूप में विराजमान मां भगवती, मनौती के लिए लगता है श्रद्धालुओं का तांता

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(संशाेधित) खिरकिया माता मंदिर में पिंडी के रूप में विराजमान मां भगवती, मनौती के लिए लगता है श्रद्धालुओं का तांता


कुशीनगर, 13 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के पडरौना तहसील क्षेत्र में स्थित खिरकिया माता मंदिर आस्था और पौराणिक मान्यताओं का प्रमुख केंद्र है। पडरौना-जटहां मुख्य मार्ग पर ऐतिहासिक झरही नदी के तट पर स्थित इस प्राचीन मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। नवरात्र के दौरान यहां का नजारा विशेष रूप से भव्य हो जाता है। दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु अपनी मन्नौती के लिए मां भगवती के दर्शन-पूजन करते हैं।

सैकड़ों वर्ष पुराना है मंदिर का इतिहास

करीब 1.44 एकड़ में फैले इस मंदिर परिसर में मां दुर्गा के मुख्य मंदिर के साथ-साथ भगवान शिव और रामभक्त हनुमान के मंदिर भी स्थापित हैं। परिसर में एक विशाल हवन कुंड है, जहां सालभर हवन-पूजन चलता रहता है। इसके अलावा, दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशाला की भी उत्तम व्यवस्था है। मान्यताओं के अनुसार, यहां मुख्य प्रतिमा स्थापित होने से पहले मां भगवती देवी पिंडी के रूप में विराजमान थीं।

बनारस के परिवार से जुड़ी है स्थापना की मान्यता

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मां भगवती की पिंडी की स्थापना सैकड़ों वर्ष पहले बनारस के प्रसिद्ध बांसफोड़ परिवार के वंशजों ने कराई थी। बताया जाता है कि उस समय यह इलाका घने जंगलों से घिरा था और झरही नदी को पार करना लोगों के लिए मुश्किल था। नदी पार करने की समस्या दूर करने के लिए यहां पुल बनवाने का प्रयास किया गया, लेकिन निर्माण के दौरान पुल बार-बार ढह जाता था।

मंदिर के पुजारी कपिलदेव मिश्र के मुताबिक, इससे परेशान निर्माणकर्ताओं ने बंगाल से एक तांत्रिक को बुलाकर पूजा-पाठ कराया। इसी दौरान तेज प्रकाश के साथ एक वृद्धा प्रकट हुईं। उन्होंने नदी किनारे देवी की पिंडी स्थापित कराने की बात कही और फिर अंतर्ध्यान हो गईं। इसके बाद पिंडी स्थापित की गई और मान्यता के अनुसार पुल का निर्माण बिना किसी बाधा के पूरा हो गया। मंदिर के पास पुराने पुल के अवशेष भी इस ऐतिहासिक प्रसंग से जोड़े जाते हैं। हालांकि, यह विवरण स्थानीय मान्यताओं पर आधारित है।

हादसों के बीच सुरक्षित रहने की भी सुनाई जाती है कथा

मंदिर और झरही नदी के पुल को लेकर स्थानीय लोगों के बीच कई चमत्कारिक कथाएं प्रचलित हैं। बुजुर्गों के अनुसार, अतीत में इस पुल पर कई बार बस पलटने और बड़े हादसे होने के बावजूद लोगों की जान सुरक्षित बच गई। स्थानीय श्रद्धालु इन घटनाओं को माता रानी की असीम कृपा से जोड़कर देखते हैं।

1.02 करोड़ रुपये से हुआ मंदिर का विकास

प्राचीन मंदिर की धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता को देखते हुए इसके भव्य स्वरूप और पर्यटन विकास की दिशा में भी पहल की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मंदिर के विकास कार्य के लिए प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति मिली थी। करीब 01 करोड़ 02 लाख 08 हजार रुपये की लागत से विकास कार्य कराया गया है। निर्माण कार्य लगभग पूरा होने के साथ ही मंदिर परिसर को अधिक भव्य और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाजनक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मोहित वर्मा