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लोकगीतों में बसती है भारतीय संस्कृति की आत्मा, नई पीढ़ी को जोड़ना समय की आवश्यकता : उदयचन्द्र परदेसी

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लोकगीतों में बसती है भारतीय संस्कृति की आत्मा, नई पीढ़ी को जोड़ना समय की आवश्यकता : उदयचन्द्र परदेसी


प्रयागराज, 30 मई (हि.स)। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज द्वारा आयोजित ‘विमर्श’ कार्यक्रम में प्रसिद्ध लोकगायक उदयचन्द्र परदेसी ने कहा कि लोकगीत हमारी सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक मूल्यों और सनातन परम्पराओं के जीवंत संवाहक हैं। सोलह संस्कारों की परम्परा को जनमानस तक पहुंचाने और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित रखने में लोकगीतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

‘‘सोलह संस्कार के संग, लोकगीतों के रंग” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उदयचन्द्र परदेसी ने भारतीय लोक परम्परा और संस्कारों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लोकगीत हमारी सनातन संस्कृति के जीवंत स्वरूप हैं, जो जीवन को संस्कारित, संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाने का कार्य करते हैं। उन्होंने बताया कि लोकसंगीत उनके लिए केवल एक कला नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत है। उनके दादा अंग्रेजी शासनकाल में सारंगी बजाकर लोकगायन करते थे, जबकि उनके पिता हारमोनियम वादन में दक्ष थे। घर में बचपन से ही संगीत का वातावरण मिलने के कारण उन्होंने विद्यालयी जीवन से हारमोनियम वादन एवं लोकगायन का अभ्यास प्रारम्भ कर दिया था। उन्होंने अपने गुरु मोहम्मद खलील का स्मरण करते हुए कहा कि लोकसंगीत की गहराई, उसकी आत्मा और समृद्ध परम्परा को समझने में उनके गुरु का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

उदयचन्द्र परदेसी ने आगे बताया कि लोकसाहित्य और लोकगीतों के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। उनकी पहली पुस्तक ‘बेटी लोक’ लोकगीतों पर आधारित है। जबकि दूसरी पुस्तक ‘बदरिन बुहार कजरी के बाहर’ कजरी एवं लोकविधा पर केंद्रित है। उनकी तीसरी पुस्तक ‘जीवन के संग लोकगीतों के राज’ प्रकाशित हो चुकी है।

इस दौरान उन्होंने सनातन परम्परा में वर्णित सोलह संस्कारों की व्याख्या करते हुए बताया कि ये संस्कार व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास के आधार स्तम्भ हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय लोकगीतों में जीवन के प्रत्येक संस्कार का सुंदर एवं सार्थक उल्लेख मिलता है और लोक परम्परा ने इन्हें जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के प्रभाव में अनेक लोकविधाएं विलुप्ति की ओर अग्रसर हैं। ऐसे में उनके संरक्षण, संवर्धन और प्रलेखन के लिए सामूहिक प्रयास समय की आवश्यकता है।

इसके पूर्व कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य वक्ता उदयचन्द्र परदेसी तथा सुप्रसिद्ध तबला वादक अनूप बनर्जी एवं केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। कार्यक्रम में उपस्थित श्रोताओं ने विषय से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे, जिनका मुख्य वक्ता ने उत्तर दिया। उन्होंने नई पीढ़ी को लोकगीतों और लोकविधाओं से जोड़ने, उनके अध्ययन, शोध, प्रलेखन तथा मंचन को प्रोत्साहित करने का आह्वान किया। अंत में केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा ने उदयचन्द्र परदेसी को अंगवस्त्र एवं पौधा भेंट कर सम्मानित किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र