वैज्ञानिक साक्ष्यों की कानूनी स्वीकार्यता समझना विधि विद्यार्थियों के लिए जरूरी : एसएस उपाध्याय
कानपुर, 02 नवंबर (हि.स.)। आधुनिक तकनीक ने अपराधों की जांच और साक्ष्य जुटाने के तरीकों को अधिक वैज्ञानिक बनाया है। डीएनए प्रोफाइलिंग, ब्रेन मैपिंग, नार्को एनालिसिस और पॉलीग्राफ जैसे परीक्षणों की जानकारी के साथ उनकी कानूनी सीमाओं और न्यायालय में स्वीकार्यता को समझना भी जरूरी है। यह बातें सोमवार को छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के अटल बिहारी वाजपेयी स्कूल ऑफ लीगल स्टडीज में आयोजित विशेष व्याख्यान में पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसएस उपाध्याय ने कहीं।
उन्होंने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 39(2) के संदर्भ में वैज्ञानिक विशेषज्ञों की राय और फॉरेंसिक साक्ष्यों की प्रासंगिकता समझाई। डीएनए प्रोफाइलिंग, नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ परीक्षण की कार्यप्रणाली बताते हुए न्यायिक प्रक्रिया में इनके उपयोग और कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डाला।
एसएस उपाध्याय ने कहा कि अच्छा अधिवक्ता या न्यायविद बनने के लिए केवल पुस्तकीय ज्ञान पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को न्यायालय की कार्यप्रणाली और व्यावहारिक अनुभव भी हासिल करना चाहिए। उन्होंने नियमित अध्ययन करने, अपने पेशे के प्रति समर्पित रहने और प्रत्येक दिन कुछ नया सीखने की सलाह दी। शिक्षकों के महत्व पर उन्होंने कहा कि गुरु के न तो कोई समान है और न ही कोई उनसे बढ़कर है।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता एसएस उपाध्याय इंस्टीट्यूट ऑफ ज्यूडिशियल ट्रेनिंग एंड रिसर्च, लखनऊ के पूर्व अतिरिक्त निदेशक भी रह चुके हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता स्कूल की निदेशिका डॉ. स्मृति राय ने की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से विद्यार्थियों को कानून के व्यावहारिक पक्ष और विशेषज्ञों के अनुभवों को समझने का अवसर मिलता है।
इस अवसर पर विधि विभाग के शिक्षक और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। कार्यक्रम का आयोजन कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक के मार्गदर्शन में किया गया। समन्वयक एवं सहायक आचार्य डॉ. विष्णु पति त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

