आईआईटी कानपुर ने वैक्सीन की प्रभावशीलता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाने वाले अणु को खोजा
कानपुर, 21 जुलाई (हि.स.)। EP67 की कार्यप्रणाली को समझना वैक्सीन और प्रतिरक्षा आधारित उपचारों के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे भविष्य में अधिक सुरक्षित और प्रभावी वैक्सीन विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होगा। यह बातें मंगलवार को आईआईटी कानपुर के जैविक विज्ञान एवं जैव अभियांत्रिकी विभाग के प्रोफेसर अरुण के. शुक्ला ने कहीं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे अणु EP67 की कार्यप्रणाली का पता लगाया है, जो भविष्य में वैक्सीन की प्रभावशीलता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है। इस शोध को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित किया गया है।
प्रो. अरुण के. शुक्ला के नेतृत्व में हुई इस शोध में वैज्ञानिकों ने पहली बार यह स्पष्ट किया कि EP67 मानव शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को किस प्रकार सक्रिय करता है। EP67 एक संभावित प्रतिरक्षा वर्धक पदार्थ है, जिसे वैक्सीन में मिलाकर शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को और मजबूत बनाया जा सकता है। शोध के अनुसार यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जबकि अनावश्यक सूजन को काफी हद तक नियंत्रित रखता है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि संक्रमण के दौरान शरीर में बनने वाले C5a प्रोटीन से प्रेरित होकर EP67 विकसित किया गया है। यह केवल दस अमीनो अम्लों से बना अणु है, जो डेंड्रिटिक कोशिकाओं और मैक्रोफेज जैसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सक्रिय करता है। यही कोशिकाएं लंबे समय तक शरीर को संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया कि EP67 शरीर में C5aR1 ग्राही से जुड़कर काम करता है। यह ग्राही जी-प्रोटीन युग्मित ग्राही समूह का हिस्सा है। प्रयोगशाला में मानव कोशिकाओं पर किए गए परीक्षण और क्रायो-इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी तकनीक से प्राप्त संरचनात्मक विश्लेषण ने इसकी कार्यप्रणाली की पुष्टि की। वैज्ञानिकों के अनुसार यह जानकारी भविष्य में EP67 को और अधिक प्रभावी तथा स्थिर बनाने में सहायक होगी।
पूर्व के पशु अध्ययनों में EP67 को कोविड-19 समेत विभिन्न विषाणुओं के खिलाफ विकसित वैक्सीन के साथ उपयोग करने पर बेहतर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया देखी गई थी। वहीं, इसने एमआरएसए जैसे प्रतिजैविक-प्रतिरोधी जीवाणु के संक्रमण से लड़ने की भी क्षमता दिखाई है। अब इसके पूर्व-नैदानिक परीक्षण किए जाएंगे।
इस शोध में आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों के साथ अमेरिका स्थित दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया। इस परियोजना को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद, अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन, जैव प्रौद्योगिकी विभाग तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से वित्तीय सहायता प्राप्त हुई।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

