home page

आयुर्वेद और रामचरितमानस की दुर्लभ पांडुलिपियां बनीं आकर्षण

 | 
आयुर्वेद और रामचरितमानस की दुर्लभ पांडुलिपियां बनीं आकर्षण


राजकीय अभिलेखागार का मनाया गया 77वां स्थापना दिवस

लखनऊ, 13 मई (हि.स.)। ऐतिहासिक दस्तावेजों, दुर्लभ पांडुलिपियों और भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार का 77वां स्थापना दिवस खास अंदाज में मनाया गया। बुधवार को लखनऊ स्थित शहीद स्मृति भवन में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा में पाण्डुलिपियों का महत्व एवं भावी पीढ़ी के लिए उपयोगिता’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी और अभिलेख प्रदर्शनी का आयोजन हुआ, जिसमें इतिहास, संस्कृति और पांडुलिपि संरक्षण से जुड़े विद्वानों ने अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम में लखनऊ विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय सहित विभिन्न शिक्षण संस्थानों से आए लगभग 200 छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की। कार्यक्रम के पहले सत्र में विशेषज्ञों ने पांडुलिपियों की उपयोगिता, संरक्षण और वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर चर्चा की। इस दौरान पांडुलिपियों को लिखने की पारंपरिक विधियों, उनके समक्ष मौजूद चुनौतियों और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने जैसे विषयों पर भी विस्तार से विचार रखे गए। वहीं दूसरे सत्र में विशेषज्ञों ने कहा कि अभिलेख और पांडुलिपियां समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं और इनके माध्यम से आने वाली पीढ़ियां भारतीय संस्कृति और इतिहास को बेहतर ढंग से समझ सकती हैं।

ताड़पत्र पर लिखी प्राचीन पांडुलिपियों ने खींचा लोगों का ध्यान

कार्यक्रम के दौरान दुर्लभ पांडुलिपियों और ऐतिहासिक अभिलेखों की विशेष प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र रही। प्रदर्शनी में लगभग 50 दुर्लभ पांडुलिपियां प्रदर्शित की गईं। इनमें लगभग 200 वर्ष पुरानी ताड़पत्र पर लिखी संस्कृत भाषा की ‘पुरुषोत्तम माहात्म्य’ पांडुलिपि विशेष आकर्षण रही, जिसमें स्कन्द पुराण में वर्णित भगवान विष्णु की लीलाओं और वैष्णव भक्तों की कथाओं का उल्लेख है। इसके अंतिम पृष्ठ पर ‘जगन्नाथाय नमः’ लिखा हुआ है।

दाराशिकोह की ‘सिर-ए-अकबर’ बनी प्रदर्शनी का खास आकर्षण

प्रदर्शनी में आयुर्वेद से जुड़ी हिन्दी पांडुलिपि ‘वैद्यक रामविनोद’ भी प्रदर्शित की गई, जो सन् 1663 ईस्वी की मानी जाती है। इसमें मानव शरीर में होने वाले 201 रोगों के लक्षण और उनके उपचार का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा मुगल शहजादा दाराशिकोह द्वारा फारसी भाषा में लिखित ‘सिर-ए-अकबर’ पांडुलिपि भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रही। वर्ष 1656-57 के आसपास लिखी गई इस पांडुलिपि में 50 उपनिषदों का फारसी अनुवाद संग्रहित है। इसके साथ ही ‘गज चिकित्सा’ नामक संस्कृत पांडुलिपि में हाथियों के रोग और उनके उपचार का वर्णन किया गया है।

वहीं प्रदर्शनी में रखी गई दुर्लभ ‘रामचरितमानस’ पांडुलिपि भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रही, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों को सुंदर चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने कहा कि पांडुलिपियां हमारी अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें सुरक्षित रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि भारत में पांडुलिपियों की परंपरा लगभग 6000 वर्ष पुरानी है और इनमें देश की गौरवगाथा, ज्ञान और इतिहास सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि पांडुलिपियां केवल इतिहास का प्रमाण नहीं हैं, बल्कि विद्यार्थियों के लिए ज्ञान और रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन