किताबों से दोस्ती ही सृजन की पहली सीढ़ी, साहित्य से दबी आवाजें बुलंद : डॉ. धनंजय चोपड़ा
-’विमर्श’ में डॉ.चोपड़ा ने उकेरे साहित्य और पत्रकारिता के अंतर्सम्बंध
प्रयागराज, 25 अप्रैल (हि.स)। साहित्य और पत्रकारिता उन आवाजों को बुलंद करने का काम करते हैं, जो पीछे छूट गई हैं या फिर दबा दी गई हैं। इन दोनों का काम अपने समय और समाज को सही व सम्यक ढंग से दर्ज करते हुए आगे बढ़ना होता है। जिस किसी ने भी अपने समय के समाज, सत्ता, बाजार, लोगों को बेहतर ढंग से पढ़ने-समझने का काम किया है, वे सफल रचनाकार हुए हैं। यह बातें वरिष्ठ पत्रकार और लेखक डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कही।
सेण्टर ऑफ मीडिया स्टडीज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम समन्वयक पद पर कार्यरत डॉ. चोपड़ा शनिवार को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित विमर्श कार्यक्रम में अपनी बात कह रहे थे।
डॉ. चोपड़ा ने कहा कि अपने समय की ध्वनियों को सहेजना ही साहित्य सृजन है। दरअसल, हमारे समाज में दुःख-सुख, सफलता-असफलता, पक्ष-विपक्ष, अमीरी- गरीबी जैसी ढेर सारी ध्वनियां होती हैं और इनसे जुड़े दृश्य होते हैं, जो हम सभी के बहुत करीब होते हैं। इन्हीं ध्वनियों को सर्जक सहेजता है और अपनी कृति में उकेर देता है। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को सृजन की दुनिया से जुड़ने के लिए जरूरी है कि वे किताबों से दोस्ती करें। अपने समय और समाज को बेहतर ढंग से समझने के लिए जरूरी है कि बेहतर किताबें पढ़ी जाएं।
सूत्रधार डॉ. प्रदीप भटनागर के सवाल डिजिटल युग में साहित्य के स्वरूप और पाठकीयता में क्या परिवर्तन आए हैं? का जबाब देते हुए उन्होंने कहा कि पढ़ने का स्वरूप अब बदल गया है। अब साहित्य केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ई-बुक, ब्लॉग, सोशल मीडिया पोस्ट और ऑडियो-वीडियो रूप (पॉडकास्ट, वेब साहित्य) में भी उपलब्ध है। लेखन अधिक संक्षिप्त, त्वरित और दृश्यात्मक हो गया है।
उल्लेखनीय है कि, पिछले चालीस से अधिक वर्षों से पत्रकारिता, संपादन और लेखन से जुड़े डॉ. धनंजय चोपड़ा की अब तक 17 पुस्तकें, 40 अध्याय, 2000 से अधिक आलेख, 100 से अधिक शोध-पत्र व आठ अनूदित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पत्रकारों को दी जाने वाली प्रतिष्ठित ‘‘के. के. बिड़ला फेलोशिप’’ के अन्तर्गत ‘‘साहित्य के पुरस्कारों का इतिहास, स्वरूप और मूल्यांकन’’ विषय पर तथा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की ‘‘सीनियर फेलोशिप’’ के अन्तर्गत ‘‘जनसंचार की वाचिक परम्परा का अप्रतिम साधन बिरहा लोकगीत’’ विषय पर शोध कार्य किया है। डॉ. चोपड़ा को भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा राजभाषा गौरव पुरस्कार एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा बाबूराव विष्णु पराड़कर पुरस्कार एवं धर्मवीर भारती पुरस्कार, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, नई दिल्ली द्वारा महात्मा गांधी हिन्दी लेखन पुरस्कार, पत्रकारिता के लिए लक्ष्मीकान्त वर्मा पुरस्कार, साहित्यिक पत्रकारिता के लिए अप्रमेय सम्मान, इलाहाबाद नाट्य संघ द्वारा नाट्यश्री तथा विज्ञान परिषद, इलाहाबाद द्वारा शताब्दी सम्मान प्राप्त हो चुका है।
इसके पूर्व कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य वक्ता डॉ चोपड़ा के साथ केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा, दीपक शर्मा (संगठन मंत्री, काशी प्रांत, संस्कार भारती), कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय और डॉ. प्रदीप भटनागर ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र

