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डिजिटल लत से आत्महत्या रोकथाम तक, मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञों ने किया जागरूक

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डिजिटल लत से आत्महत्या रोकथाम तक, मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञों ने किया जागरूक


कानपुर, 10 अक्टूबर (हि.स.)। मानसिक स्वास्थ्य की बेहतर समझ, आत्महत्या के चेतावनी संकेतों की पहचान और डिजिटल तकनीक का संतुलित इस्तेमाल युवाओं के लिए बेहद जरूरी है। तकनीक का उपयोग जीवन को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए, न कि वह व्यक्ति के व्यवहार और जीवन को नियंत्रित करने लगे। यह बातें शनिवार को कला, मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के निदेशक डॉ. अमित कुमार मिश्रा ने छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर कही।

विश्वविद्यालय के नैदानिक मनोविज्ञान विभाग और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में नौ और 10 अक्टूबर को ‘मन, मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य: एक स्वस्थ डिजिटल पीढ़ी का निर्माण’ विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें विद्यार्थियों को मानसिक स्वास्थ्य, आत्महत्या रोकथाम, डिजिटल तनाव और स्क्रीन के अत्यधिक इस्तेमाल से जुड़ी चुनौतियों के बारे में जानकारी दी गई।

कार्यशाला के पहले दिन मानसिक स्वास्थ्य के जैव-मनो-सामाजिक प्रतिमान और आत्महत्या रोकथाम में सहयोगी की भूमिका पर सत्र हुए। एम्स के मनोचिकित्सा विभाग में मानसिक स्वास्थ्य में तंत्रिका-संशोधन से संबंधित उन्नत अनुसंधान एवं उत्कृष्टता केंद्र के प्रभारी डॉ. नंद कुमार ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य पर जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है। उन्होंने नींद, जैविक घड़ी और तनाव के बीच संबंधों को समझाते हुए मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समग्र दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।

एम्स के मनोवैज्ञानिक एवं वैश्विक एकीकृत स्वास्थ्य केंद्र के परियोजना प्रमुख हर्षुल अरोड़ा ने आत्महत्या रोकथाम में सहयोगी की भूमिका पर प्रशिक्षण दिया। उन्होंने संकट से गुजर रहे व्यक्ति के चेतावनी संकेतों को पहचानने, उसकी बात संवेदनशीलता से सुनने और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों से सहायता दिलाने की जानकारी दी। सत्र में जोखिम कारकों, मादक पदार्थों के सेवन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी भ्रांतियों पर भी चर्चा हुई।

दूसरे दिन विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर स्क्रीन के अत्यधिक इस्तेमाल और डिजिटल लत के प्रभावों पर चर्चा की गई। एम्स की वैज्ञानिक-सी डॉ. दीपिका दहिमा ने डिजिटल तनाव के मनोवैज्ञानिक पहलुओं और आभासी तथा वास्तविक व्यक्तित्व के बीच अंतर को समझाया। डॉ. नंद कुमार ने सामाजिक तुलना, स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग और आत्मसम्मान के संबंधों पर प्रकाश डाला। विद्यार्थियों ने कविता-पाठ और नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य तथा डिजिटल लत से जुड़ी चुनौतियों को प्रस्तुत किया।

समापन सत्र में विश्वविद्यालय के गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के निदेशक एवं उन्नत अध्ययन तथा सामाजिक विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता प्रो. संदीप कुमार सिंह ने डिजिटल तकनीक के विवेकपूर्ण उपयोग और विद्यार्थियों के समग्र विकास पर जोर दिया। कार्यशाला का आयोजन नैदानिक मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. प्रियंका शुक्ला ने किया। इसमें विभिन्न विभागों के शिक्षक, अकादमिक सदस्य और बड़ी संख्या में विद्यार्थी शामिल हुए।

हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप