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सदैव नवीन ही रहता है भगवान का भजन : स्वामी राजेंद्रदास

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सदैव नवीन ही रहता है भगवान का भजन : स्वामी राजेंद्रदास


सदैव नवीन ही रहता है भगवान का भजन : स्वामी राजेंद्रदास


सदैव नवीन ही रहता है भगवान का भजन : स्वामी राजेंद्रदास


सदैव नवीन ही रहता है भगवान का भजन : स्वामी राजेंद्रदास


गोरखपुर, 24 सितंबर (हि.स.)। युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन वृंदावन से पधारे कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी श्री राजेंद्रदास देवाचार्य जी महाराज ने व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को भक्ति, गुरु महिमा एवं आध्यात्मिक जीवन का संदेश दिया। कथा व्यास ने कहा कि श्रीमद्भागवत जैसी पावन कथाएं और भगवान का भजन-कीर्तन कभी पुराने नहीं होते। जितनी बार कथा श्रवण करो या भजन-कीर्तन करो, यह सदैव नवीन नहीं रहते हैं।

कथा व्यास स्वामी श्री राजेंद्रदास जी महाराज ने राधाष्टमी महोत्सव का गीत गाकर श्रद्धालुओं को वृंदावन के छठी महोत्सव के आनंद की अनुभूति कराई। इसके साथ ही गीतावली के उत्तरकांड का एक पद हनुमान जी को समर्पित करते हुए श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

कथा व्यास ने कहा कि गोरक्षा की आशा गोरक्षपीठ से ही है। गोरक्षपीठ सदैव गोरक्षा के लिए कार्य करती रही है। इसलिए सनातन धर्म और गोरक्षा के लिए योगी जी को पुनः प्रचंड बहुमत से जीतना होगा। उन्होंने कहा कि शास्त्र-वचन को तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है, किंतु जिस गुरु के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया है, वहां तर्क नहीं करना चाहिए। गुरु ने जैसा कहा है, उसे बिना विचार किए स्वीकार करना चाहिए। तभी जीवन का वास्तविक कल्याण संभव है।

कथा व्यास ने कहा कि लौकिक वस्तुओं के अभाव की पूर्ति को कल्याण नहीं कहा जा सकता। वास्तविक कल्याण वह है, जिससे आत्यंतिक दुख की निवृत्ति हो जाए। यह भगवान के चरणों की प्राप्ति से ही संभव है और गुरु अपने शिष्य को भगवान के चरणों तक पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि साधक को शरीर पर उतना ही ध्यान देना चाहिए, जितने में उसका कार्य चल जाए। इससे अधिक शरीर की व्यवस्था में लगे रहना व्यर्थ है। यह शरीर नाशवान है, किंतु इसी शरीर के माध्यम से भगवान की प्राप्ति हो सकती है। इसलिए भगवान की प्राप्ति में शरीर का उपयोग करना ही इसकी सार्थकता है।

कथा व्यास ने कहा कि हम अपने किसी भी कार्य में आलस्य नहीं करते, लेकिन जब भजन की बात आती है तो आलस्य करने लगते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि भजन ही हमें भवसागर से पार कराएगा। जीवन में व्यक्ति कितना भी व्यस्त क्यों न हो, उसे भगवान के भजन के लिए समय अवश्य निकालना चाहिए। सौ काम छोड़कर भोजन, हजार काम छोड़कर दान और करोड़ों कार्य छोड़कर हरि का भजन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतवर्ष में अध्यात्म सबसे सस्ता है। यहां का सामान्य व्यक्ति भी तत्त्वज्ञान की बातें कर सकता है, लेकिन वास्तविक संतों का पता लगाना कठिन होता है। ऐसे संत प्रायः छिपे रहते हैं। ऐसे संतों का संग प्राप्त होने के बाद भी जो व्यक्ति अपने मन को संसार में ही लगाए रखता है, उसे मन्दभाग्य कहा जाता है। उन्होंने भगवान के भजन में आने वाले पांच दोषों से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि विषयभोग, निद्रा, हंसी, संसार के प्रति अत्यधिक प्रेम और अधिक बात करना भजन में बाधक हैं। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर के काम और क्रोध उतने बाधक नहीं हैं, क्योंकि यदि हमारी बुद्धि भगवत्-निष्ठ हो जाए तो इन विकारों का भी भगवान की भक्ति में उपयोग किया जा सकता है।

कथा व्यास ने कहा कि आलस्य हमारे जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है, जो शरीर के भीतर ही विद्यमान रहता है। इसलिए आलस्य का त्याग करके भगवान की कथा सुननी चाहिए, क्योंकि भगवान की कथा हमारे भीतर अविद्या-जन्य विकारों का नाश कर भक्ति उत्पन्न करती है।

उन्होंने कहा कि जिनके कान समुद्र के समान हैं, उनमें भगवान की कथा रूपी नदियां निरंतर जाकर मिलती रहती हैं, फिर भी उनके कान कभी तृप्त नहीं होते। भगवान की कथा से जो तृप्त हो जाते हैं, वे वास्तव में कथा के मर्म को समझ नहीं पाते।

नैमिष तीर्थ की महिमा बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि नैमिष क्षेत्र में कलियुग के दोषों का प्रभाव नहीं है। आज भी वहां किसी मंत्र की सिद्धि शीघ्र होती है। उन्होंने कहा कि परम धर्म वही है, जिसके आचरण से भगवान के चरणों की प्राप्ति हो। वह परम धर्म अहैतुकी भक्ति है, जो किसी कामना से नहीं की जाती।

हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय