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अपने आचरण से पिता को तृप्त करना ही पुत्र का धर्म : मिथिलेशनंदिनी शरण

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अपने आचरण से पिता को तृप्त करना ही पुत्र का धर्म : मिथिलेशनंदिनी शरण


अयोध्या-फैजाबाद पुस्तक मेला पुरस्कार वितरण समारोह

अयोध्या, 29 अक्टूबर (हि.स.)।अपने आचरण से पिता को तृप्त करना ही पुत्र का धर्म है। दर्पण श्रृंगार करना नहीं सिखाता, बल्कि वह रूप को प्रतिबिंबित करता है। ये बातें सिद्धपीठ हनुमन्निवास के महंत आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने नारायण दास खत्री मेमाेरियल ट्रस्ट के संयोजन में आयोजित अयोध्या-फैजाबाद पुस्तक मेले के पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में कहीं।

उन्होंने कहा कि पुस्तकों का अस्तित्व मनुष्य के समकालीन ही है। मनुष्य ने खुद को उस दिन मनुष्य साबित किया होगा जिस दिन उसने किताब हाथ में ली होगी। वेद इसकी पुष्टि करते हैं। ब्रह्मा के हाथ में वेदों का होना इस बात का साक्षी है कि मनुष्य और पुस्तकों के अस्तित्व के बीच का फासला बहुत अधिक नहीं रहा होगा। संकल्प को निर्बाध रूप से निभाना महत्वपूर्ण है। जीवन का मूल्य बोध इससे तय होता है कि संकल्प को निभाने की हमारी प्रतिज्ञा कैसी है? उन्होंने आयोजन की सराहना की। कहा प्रतियोगिताएं यह तय करती हैं कि बच्चों की परिकल्पनाएं आकार ले रही हैं तथा वे राष्ट्र के निर्माण पथ पर आगे बढ़ रहे हैं। केंद्र से हटा हुआ व्यक्ति या समाज अपना द्वंद को समाप्त नहीं कर पाता। आचार्य मिथिललेशनंदिनी शरण ने इस आयोजन के लिए पूर्व सांसद डा. निर्मल खत्री व कोषाध्यक्ष राजकुमार खत्री के योगदान की सराहना की। कार्यक्रम स्थल पहुंचने पर ट्रस्ट कोषाध्यक्ष राजकुमार खत्री ने आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण तथा लक्ष्मणकिला के महंत मैथिलीरमण शरण का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया। विशिष्ट अतिथि मंजुला झुनझुनवाला ने कहा कि किताबें हमारी सोच को समृद्ध बनाती हैं। कोषाध्यक्ष राजकुमार खत्री व मेला प्रभारी रीता खत्री ने मुख्य व विशिष्ट अतिथियों को स्मृतिचिह्न प्रदान किया, पुस्तक मेले में आए प्रतिष्ठित प्रकाशनों को भी पुरस्कृत किया गया।

हिन्दुस्थान समाचार / पवन पाण्डेय