आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं ने वॉशिंगटन विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला के साथ छोटे प्रोटीन तैयार करने की विकसित की नई विधि
कानपुर, 03 सितंबर (हि.स.)। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से ऐसे छोटे प्रोटीन तैयार किए जा सकते हैं, जो कठिन लक्ष्यों वाले रिसेप्टर्स को अधिक सटीक तरीके से निशाना बना सकें। इससे नई दवाओं की शुरुआती खोज को तेज करने और लागत कम करने में मदद मिल सकती है। यह बातें गुरुवार को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के प्रो. अरुण के. शुक्ला ने कहीं।
आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं ने वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. डेविड बेकर की प्रयोगशाला के साथ मिलकर छोटे प्रोटीन तैयार करने की नई विधि विकसित करने में योगदान दिया है। इसके जरिए जी-प्रोटीन युग्मित रिसेप्टर्स को लक्षित करने वाले छोटे प्रोटीन तैयार किए जा सकते हैं। यह शोध प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ है।
जी-प्रोटीन युग्मित रिसेप्टर्स कोशिकाओं की सतह पर मौजूद होते हैं और बाहरी संकेतों को कोशिका के भीतर पहुंचाने का काम करते हैं। शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में इनकी भूमिका होती है और अनेक दवाएं इन्हीं रिसेप्टर्स को निशाना बनाती हैं।
नई विधि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से ऐसे छोटे प्रोटीन तैयार किए गए, जिनके विशेष रिसेप्टर से जुड़ने की संभावना अधिक थी। इसके बाद बेहतर प्रोटीनों का ही प्रयोगशाला में परीक्षण किया गया। इससे बड़ी संख्या में रासायनिक यौगिकों की जांच की जरूरत कम हो सकती है और दवा खोज की शुरुआती प्रक्रिया तेज हो सकती है।
शोध दल ने कई जी-प्रोटीन युग्मित रिसेप्टर्स को लक्षित करने वाले छोटे प्रोटीन तैयार किए। इनमें सीएक्ससीआर-4 और सीसीआर-5 भी शामिल हैं, जो कैंसर और एचआईवी जैसे संक्रमणों से जुड़े हैं।
आईआईटी कानपुर का प्रमुख योगदान सीएक्ससीआर-4 रिसेप्टर से जुड़ने वाले एक छोटे प्रोटीन की संरचना समझने में रहा। संस्थान की क्रायो-ईएम सुविधा में क्रायो-इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शिता तकनीक से यह अध्ययन किया गया कि प्रोटीन रिसेप्टर से किस तरह जुड़ता है और उसकी कार्यप्रणाली को कैसे प्रभावित करता है।
शोध का नेतृत्व प्रो. डेविड बेकर की प्रयोगशाला ने किया। प्रो. बेकर को वर्ष 2024 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला था। आईआईटी कानपुर के प्रो. अरुण के. शुक्ला के साथ डॉ. रामानुज बनर्जी, मणिशंकर गांगुली, अन्नू दलाल, सुधा मिश्रा और शाची सिन्हा ने भी शोध में योगदान दिया।
इस शोध कार्य को अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन, जैव प्रौद्योगिकी विभाग और लेडी टाटा मेमोरियल ट्रस्ट से सहयोग मिला। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक दवा खोज के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि, तैयार किए गए प्रोटीन अभी दवाएं नहीं हैं और चिकित्सकीय इस्तेमाल से पहले कई चरणों के परीक्षण आवश्यक होंगे।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप

