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राष्ट्रीय अस्मिता की अंगड़ाई स्पष्ट सुनाई पड़ रही: डा.पवनपुत्र बादल

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राष्ट्रीय अस्मिता की अंगड़ाई स्पष्ट सुनाई पड़ रही: डा.पवनपुत्र बादल


लखनऊ, 18 अक्टूबर (हि.स.)। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डा.पवनपुत्र बादल ने कहा कि केरल में भी अब राष्ट्रीय अस्मिता की अंगड़ाई स्पष्ट सुनाई पड़ रही है। निकट भविष्य में इसके सार्थक परिणाम देखने को मिलेंगे।

केंद्रीय साहित्य अकादमी, अखिल भारतीय साहित्य परिषद और केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में 'वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ' के उपलक्ष्य में दो दिवसीय संगोष्ठी हुई। वहां से लौटकर आये डा.पवन पुत्र बादल ने बताया कि केरल के कासरगोड में 'वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ' के उपलक्ष्य में हुई संगोष्ठी राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रही। उन्होंने बताया कि इस दौरान वामपंथी संगठनों से जुड़े कुछ छात्रों ने विरोध प्रदर्शन का असफल प्रयास जरूर किया पर उससे विषय की गंभीरता और कार्यक्रम की गंभीरता में कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके बाद से वामपंथी धड़े के एक्टिविस्ट सोशल मीडिया पर फेक नैरेटिव फैला रहे हैं। वह लिख रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उनके प्रतिरोध ने उलटे पैर वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। वस्तुस्थिति इससे पूरी तरह उलट रही।

उद्घाटन सत्र में प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने मुख्य वक्तव्य दिया। समापन सत्र में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के महासचिव डॉ.पवनपुत्र बादल ने साहित्य और इतिहास के संबंध पर विचार रखे।

उन्होंने कहा कि इतिहास घटनाओं को क्रम देता है, जबकि साहित्य उन्हें अर्थ देता है। उन्होंने ‘आनंदमठ’ और 1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन के संदर्भ में साहित्य की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने यह भी कहा कि पहले भारतीय एक-दूसरे की भाषाएं सीख कर बंकिम और भारती जैसे रचनाकारों को पढ़ते थे। उनका वक्तव्य संगोष्ठी की उस मूल धारणा से जुड़ा था जिसमें साहित्य को राष्ट्रीय चेतना के निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया। समापन सत्र के मुख्य अतिथि राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ को महत्वपूर्ण अवसर के रूप में प्रस्तुत किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / बृजनंदन