यादों को फिर से मुस्कुराने दो’ का लोकार्पण, साहित्य से दूर होती युवा पीढ़ी पर पद्मश्री तिवारी ने जताई चिंता
गोरखपुर, 25 अक्टूबर (हि.स.)। स्मृतियां केवल अतीत की प्रतिध्वनियां नहीं, बल्कि वर्तमान की संवेदनाओं और भविष्य की आकांक्षाओं को जोड़ने वाली जीवन की अक्षय निधि हैं। जब यही स्मृतियां सृजनशील चेतना का स्पर्श पाकर कविता में ढलती हैं, तब वे व्यक्तिगत अनुभूतियों की सीमाएं लांघकर व्यापक मानवीय सरोकारों की अभिव्यक्ति बन जाती हैं। साहित्य की इसी संवेदनात्मक और सर्जनात्मक भूमिका पर रविवार को गोरखपुर के बैंक रोड स्थित होटल विवेक उत्सव लॉन में गंभीर विमर्श हुआ। अवसर था वरिष्ठ कवयित्री एवं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, गोरखपुर की पूर्व अध्यक्ष डॉ. प्रतिभा गुप्ता के काव्य संग्रह ‘यादों को फिर से मुस्कुराने दो’ के लोकार्पण का।
मुख्य अतिथि साहित्य अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष एवं पद्मश्री सम्मान से अलंकृत प्रख्यात साहित्यकार प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने सृजनशीलता और श्रमसाधना के अंतर्संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रतिभा एक प्रतिशत और कठिन परिश्रम 99 प्रतिशत होता है। उन्होंने वर्तमान युवा पीढ़ी के साहित्य से विमुख होने पर चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि युवा लोकभावनाओं और विचारों की दुनिया से दूर होकर तात्कालिकता की ओर अग्रसर हो रहे हैं। साहित्य से बढ़ती यह दूरी चिंतनीय है। उनके संबोधन में निरंतर अध्ययन, गहन चिंतन और कठिन साधना के माध्यम से रचनात्मक चेतना को समृद्ध करने की आवश्यकता विशेष रूप से उभरकर सामने आई।
माँ सरस्वती की वंदना से आरंभ हुए समारोह की अध्यक्षता सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु के पूर्व कुलपति प्रो. सुरेन्द्र दुबे ने की। उन्होंने कविता की मानवीय संवेदनशीलता और सांस्कृतिक चेतना को रेखांकित करते हुए कहा कि जो कविता लिखता है, वह अराजक नहीं हो सकता। कविता मनुष्य के भीतर संवेदनशील दृष्टि और मानवीय सरोकारों को विकसित करने वाली सर्जनात्मक अभिव्यक्ति है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की महत्ता पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि जब हम अपनी परंपरा के सान्निध्य में आते हैं और उससे परिचित होते हैं, तभी हमें समय की वास्तविक कीमत का बोध होता है। उन्होंने डॉ. प्रतिभा गुप्ता को उनके काव्य संग्रह के प्रकाशन पर बधाई दी और उनके साहित्यिक प्रयास की सराहना की।
विशिष्ट वक्ता एवं गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार राय ने चिकित्सा और साहित्य के अंतर्संबंधों का गहन दार्शनिक विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कविता मनुष्य के अंतःकरण और संवेदनाओं की दुनिया है। किसी चिकित्सक के भीतर कवि की उपस्थिति विशेष रूप से सराहनीय है। भारतीय ज्ञान परंपरा में कवि और वैद्य के संबंधों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि चिकित्सक जिस सूक्ष्मता से शरीर के अंग-प्रत्यंग और उसकी जटिलताओं का अध्ययन करता है, उसी गहराई से कवि शब्दों, भाषा और मानवीय अनुभूतियों के अंतरंग संसार में प्रवेश करता है।
प्रो. राय ने कहा कि चिकित्सक शरीर को निरोग बनाने का प्रयास करता है, जबकि कवि मनुष्य के मन और अंतःकरण को परिष्कृत करता है। जब कोई चिकित्सक साहित्य-सृजन भी करता है, तब वह दोहरी मानवीय जिम्मेदारी निभाता है। एक ओर वह शारीरिक व्याधियों के निवारण में योगदान देता है, तो दूसरी ओर अपनी रचनाओं से मनुष्य के अंतर्मन को संवेदनशील बनाता है। इस संदर्भ में उन्होंने चिकित्सक-साहित्यकार डॉ. संजय चतुर्वेदी और डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के साहित्यिक योगदान का उल्लेख किया।
डॉ. प्रतिभा गुप्ता के काव्य संग्रह का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते हुए प्रो. राय ने कहा, “अतीत की कैदी नहीं हैं इनकी स्मृतियाँ।” उनकी कविताएँ केवल बीते हुए समय का स्मरण नहीं करतीं, बल्कि वर्तमान से जीवंत संवाद स्थापित करती हैं और भविष्य के लिए एक सुंदर संसार का स्वप्न भी देखती हैं। उन्होंने कहा कि कवयित्री ने अपनी भूमिका में स्मृतियों को सृजनात्मक धरातल पर पुनः प्रस्तुत करने की बात कही है, किंतु संग्रह में अतीत के साथ वर्तमान की अनुभूतियां और भविष्य की आकांक्षाएं भी विद्यमान हैं। कवि का स्वप्न केवल स्मृतियों की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि एक अधिक मानवीय और संवेदनशील संसार की परिकल्पना भी होता है।
प्रो. राय ने अपने संबोधन में मंच पर उपस्थित अपने दो गुरुओं के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि समारोह में स्मृति चिह्न से सम्मानित किया जाना प्रसन्नता का विषय है, किंतु अपने गुरुओं के साथ एक ही मंच पर बैठने का अवसर उनके लिए उससे भी बड़ा सम्मान है।
गोरखपुर के महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव ने कहा कि लेख को काव्य में प्रस्तुत करना अत्यंत कठिन कार्य है। विचारों और अनुभूतियों को काव्यात्मक अभिव्यक्ति देने के लिए विशेष सर्जनात्मक क्षमता तथा संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। उन्होंने डॉ. प्रतिभा गुप्ता के साहित्यिक प्रयास की सराहना करते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया। समारोह में बी.आर.डी. मेडिकल कॉलेज की पूर्व प्रोफेसर डॉ. राधा जीना भी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं।
डॉ. प्रतिभा गुप्ता का व्यक्तित्व चिकित्सा सेवा और साहित्यिक साधना के सुंदर समन्वय का परिचायक है। चिकित्सा जैसे उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यक्षेत्र में रहते हुए साहित्य के प्रति उनकी रचनात्मक अभिरुचि मानवीय संवेदनाओं की व्यापकता को अभिव्यक्त करती है। उनका काव्य संग्रह ‘यादों को फिर से मुस्कुराने दो’ स्मृतियों के माध्यम से जीवन की अनुभूतियों, आत्मीय संबंधों और समय के साथ मनुष्य के संवेदनात्मक जुड़ाव की ओर ध्यान आकर्षित करता है। संग्रह पर हुए साहित्यिक विमर्श में अतीत, वर्तमान और भविष्य के अंतर्संबंधों को विशेष महत्व मिला।
समारोह में चिकित्सा, साहित्य, शिक्षा, व्यवसाय एवं सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व उपस्थित रहे। इनमें इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, गोरखपुर के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आर. पी. शुक्ल, डॉ. अश्विनी अग्रवाल, डॉ. अमित मित्तल, डॉ. प्रदीप गुप्ता, डॉ. एस. सी. वैश्य, डॉ. विमल मोदी, डॉ. राजेश गुप्ता, डॉ. पी. सी. शाही, डॉ. मधुबाला, डॉ. अंजू श्रीवास्तव, डॉ. नवनीत जयपुरियार, डॉ शिव शंकर शाही, डॉ. सुगंधा भारती, डॉ. आर. के. पांडेय, डॉ. अनुभूति दूबे, डॉ. बबिता शुक्ला, डॉ. ए. के. चतुर्वेदी, डॉ. सत्या पांडेय तथा डॉ. दीप्ति चतुर्वेदी, महेश गर्ग, सीए अनुपम गुप्ता, अचिन्त्य लहरी, मान्धाता सिंह, अंकित मिश्र,रीना त्रिपाठी,आशुतोष मिश्र, विनोद पांडेय, रामपाल सिंह, नवीन पांडेय, अमरनाथ जयसवाल, रामसमुझ संवरा एवं सुधांशु चंद्र वर्मा सहित अनेक साहित्य प्रेमियों, चिकित्सकों, शिक्षाविदों तथा गणमान्य नागरिकों ने समारोह में सहभागिता की।
कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं रंगकर्मी डॉ. अमृता सरकारी जयपुरिया ने किया। समारोह के अंत में डॉ. क्यूरी गुप्ता व डॉ तन्वी गुप्ता ने आभार ज्ञापन करते हुए मुख्य अतिथि, अध्यक्ष, विशिष्ट वक्ता, सभी गणमान्य अतिथियों, चिकित्सकों, साहित्यकारों, आयोजन से जुड़े सहयोगियों तथा मीडिया प्रतिनिधियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।
कार्यक्रम के आयोजक वरिष्ठ सर्जन डॉ. एपी गुप्ता ने कहा कि साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं से समृद्ध गोरखपुर की धरती पर आयोजित इस समारोह ने एक बार फिर रेखांकित किया कि कविता केवल व्यक्तिगत भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, सांस्कृतिक स्मृतियों और भविष्य की सर्जनात्मक संभावनाओं की संवाहक भी है। ‘यादों को फिर से मुस्कुराने दो’ के लोकार्पण ने साहित्य की इसी जीवनदायिनी चेतना को विमर्श के केंद्र में स्थापित किया।
हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय

