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क्रिकेट जगत ने खोया महान ऑलराउंडर: वेस्टइंडीज क्रिकेटर गैरी सोबर्स का 89 वर्ष की उम्र में निधन

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क्रिकेट जगत ने खोया महान ऑलराउंडर: वेस्टइंडीज क्रिकेटर गैरी सोबर्स का 89 वर्ष की उम्र में निधन


ब्रिजटाउन, 17 जुलाई (हि.स.)। विश्व क्रिकेट के महानतम ऑलराउंडरों में शामिल सर गैरी सोबर्स का 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से क्रिकेट जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। सोबर्स को खेल के इतिहास के सबसे संपूर्ण क्रिकेटरों में गिना जाता है, जिन्होंने बल्लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग—तीनों विभागों में अपनी अमिट छाप छोड़ी।

1936 में बारबाडोस में जन्मे सोबर्स ने मात्र 16 वर्ष की उम्र में बारबाडोस के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया और 1954 में वेस्टइंडीज की टेस्ट टीम में जगह बनाई। शुरुआती दौर में उन्हें एक गेंदबाज के रूप में चुना गया था, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी और बहुमुखी प्रतिभा से दुनिया को प्रभावित किया।

365 रन की ऐतिहासिक पारी से बनाया विश्व रिकॉर्ड

साल 1958 में पाकिस्तान के खिलाफ उन्होंने अपने टेस्ट करियर का पहला शतक लगाया और नाबाद 365 रन की ऐतिहासिक पारी खेली। यह उस समय टेस्ट क्रिकेट की एक पारी का सबसे बड़ा व्यक्तिगत स्कोर था। उनका यह रिकॉर्ड 36 वर्षों तक कायम रहा, जिसे 1994 में वेस्टइंडीज के ही ब्रायन लारा ने तोड़ा।

एक ओवर में छह छक्के लगाने वाले पहले बल्लेबाज

सोबर्स ने 1968 में इंग्लैंड में नॉटिंघमशायर की ओर से खेलते हुए ग्लेमोर्गन के खिलाफ एक ओवर की सभी छह गेंदों पर छह छक्के जड़कर विश्व क्रिकेट में नया इतिहास रचा। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में यह उपलब्धि हासिल करने वाले वह दुनिया के पहले बल्लेबाज बने।

बल्ले और गेंद दोनों से रहे बेमिसाल

सोबर्स ने 1954 से 1974 के बीच वेस्टइंडीज के लिए 93 टेस्ट मैच खेले, जिनमें 57.78 की औसत से 8,032 रन बनाए और 235 विकेट भी अपने नाम किए। वह बाएं हाथ के बल्लेबाज होने के साथ-साथ बाएं हाथ से तेज-मध्यम गति, ऑर्थोडॉक्स स्पिन और रिस्ट स्पिन—तीनों तरह की गेंदबाजी करने में सक्षम थे। उनकी फुर्तीली फील्डिंग भी उनकी पहचान रही।

प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने 383 मैचों में 28,000 से अधिक रन बनाए और 1,000 से ज्यादा विकेट हासिल किए, जो उनकी असाधारण ऑलराउंड क्षमता का प्रमाण है।

कप्तान, कोच और प्रेरणास्रोत

सर गैरी सोबर्स ने आक्रामक अंदाज में वेस्टइंडीज की कप्तानी भी की और टीम को नई पहचान दिलाई। संन्यास के बाद उन्होंने श्रीलंका की टीम को कोचिंग दी और युवा खिलाड़ियों के विकास के लिए जमीनी स्तर पर कई कार्यक्रम शुरू किए।

क्रिकेट में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें 1975 में 'नाइटहुड' (सर) की उपाधि से सम्मानित किया गया। इसके बाद 2009 में आईसीसी हॉल ऑफ फेम में भी उन्हें शामिल किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / आकाश कुमार राय