झारखंड में सड़क हादसों का कहर, छह माह में 2,478 लोगों की मौत
-जनवरी-जून 2026 में 3,078 दुर्घटनाएं, तेज रफ्तार और सड़क किनारे पार्किंग प्रमुख चिंताओं में
रांची, 08 अक्टूबर (हि.स.)। झारखंड में सड़क दुर्घटनाएं गंभीर सामाजिक और मानवीय चुनौती बनती जा रही हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जनवरी से जून 2026 के दौरान राज्य में 3,078 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 2,478 लोगों की मौत हुई। यानी छह महीने में औसतन हर दिन करीब 17 दुर्घटनाएं हुईं और करीब 14 लोगों की जान गई।
पिछले वर्षों के आंकड़े भी सड़क दुर्घटनाओं की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2021 में 3,513, 2022 में 3,898, 2023 में 4,173 और 2024 में 4,114 लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत हुई। वहीं 2025 में जनवरी से नवंबर तक 4,111 मौतें दर्ज की गईं। इन अवधियों के आंकड़ों को जोड़ने पर मृतकों की संख्या 19,809 होती है। हालांकि 2025 का आंकड़ा नवंबर तक और 2026 का जून तक का है, इसलिए इन्हें संबंधित वर्षों का अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
रांची में सबसे अधिक दुर्घटनाएं
राज्य पुलिस मुख्यालय के जनवरी से जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार, रांची में सबसे अधिक 408 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 286 लोगों की मौत हुई। धनबाद में 208 हादसों में 118, हजारीबाग में 195 में 163 और गिरिडीह में 194 हादसों में 180 लोगों की जान गई।
पलामू में 170 दुर्घटनाओं में 135, बोकारो में 169 में 125, पूर्वी सिंहभूम में 166 में 117, गुमला में 150 में 136, दुमका में 134 में 122 और रामगढ़ में 126 हादसों में 107 लोगों की मौत हुई।
देवघर में 121 दुर्घटनाओं में 86, सरायकेला-खरसावां में 125 में 107, पश्चिमी सिंहभूम में 117 में 114, चतरा में 84 में 77, सिमडेगा में 83 में 82, लातेहार में 83 में 65, गोड्डा में 72 में 64 और साहिबगंज में 69 हादसों में 55 लोगों की मौत हुई।
लोहरदगा में 58 दुर्घटनाओं में 51, कोडरमा में 58 में 42, जामताड़ा में 45 में 41 और पाकुड़ में 43 दुर्घटनाओं में 42 लोगों की जान गई।
गिरिडीह, गुमला, पश्चिमी सिंहभूम और सिमडेगा जैसे जिलों के आंकड़े विशेष ध्यान आकर्षित करते हैं, जहां दुर्घटनाओं की संख्या की तुलना में मृतकों का आंकड़ा काफी अधिक है। हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर दुर्घटनाओं के कारणों का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके लिए सड़क की स्थिति, वाहनों की गति, दुर्घटना के प्रकार और घायलों को चिकित्सा सुविधा मिलने में लगे समय जैसे पहलुओं का अध्ययन जरूरी है।
कोल्हान प्रमंडल में भी स्थिति चिंताजनक
कोल्हान प्रमंडल के तीनों जिलों में भी सड़क दुर्घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। जनवरी से जून 2026 के दौरान पूर्वी सिंहभूम में 166 दुर्घटनाओं में 117, पश्चिमी सिंहभूम में 117 दुर्घटनाओं में 114 और सरायकेला-खरसावां में 125 दुर्घटनाओं में 107 लोगों की मौत हुई।
पश्चिमी सिंहभूम में 2025 के दौरान 209 सड़क दुर्घटनाओं में 214 लोगों की मौत हुई थी। वहीं, 2026 की पहली छमाही में 117 हादसों में 114 लोगों की जान गई। पूर्वी सिंहभूम में 2025 में 273 दुर्घटनाओं में 176 मौतें दर्ज हुई थीं। जमशेदपुर से घाटशिला, चाईबासा, मुसाबनी, बहरागोड़ा और अन्य प्रमुख मार्गों पर सड़क सुरक्षा उपायों की लगातार निगरानी की जरूरत इन आंकड़ों से सामने आती है।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी गंभीर स्थिति
राष्ट्रीय राजमार्गों पर दुर्घटनाओं की संख्या के मुकाबले मृतकों का आंकड़ा भी गंभीर चिंता पैदा करता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2023 में झारखंड के राष्ट्रीय राजमार्गों पर 313 दुर्घटनाओं में 291 लोगों की मौत हुई। 2024 में 427 दुर्घटनाओं में 354 और 2025 में 383 दुर्घटनाओं में 326 लोगों की जान गई।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर तेज रफ्तार, भारी वाहनों की आवाजाही, सड़क किनारे खड़े वाहन, अनियंत्रित कट और रात में कम दृश्यता जैसे कारक जोखिम बढ़ा सकते हैं। ऐसे स्थानों पर ब्लैक स्पॉट की पहचान, पर्याप्त संकेतक, प्रकाश व्यवस्था, गति नियंत्रण और आपातकालीन सहायता की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
तेज रफ्तार सबसे बड़ी चुनौतियों में
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में तेज रफ्तार से जुड़ी 3,715 दुर्घटनाएं हुईं। इनमें 2,910 लोगों की मौत और 2,149 लोग घायल हुए। यह आंकड़ा सड़क सुरक्षा अभियान में गति नियंत्रण को प्रमुख मुद्दा बनाने की जरूरत को रेखांकित करता है।
तेज रफ्तार के अलावा शराब या नशीले पदार्थों के प्रभाव में वाहन चलाना, गलत तरीके से ओवरटेकिंग, हेलमेट और सीट बेल्ट का इस्तेमाल नहीं करना तथा वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग भी दुर्घटना के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। सड़क की खराब स्थिति और यातायात संकेतों की कमी भी कुछ स्थानों पर समस्या को गंभीर कर सकती है।
शाम छह से रात नौ बजे के बीच अधिक दुर्घटनाएं
एनसीआरबी के 2024 के आंकड़ों के अनुसार शाम छह बजे से रात नौ बजे के बीच 1,079 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं, जो विभिन्न समयावधियों में सबसे अधिक थीं। दोपहर तीन से शाम छह बजे के बीच 946, दोपहर 12 से तीन बजे के बीच 706 और सुबह नौ से दोपहर 12 बजे के बीच 658 दुर्घटनाएं हुईं।
शाम के समय बढ़ता यातायात, अंधेरा और कुछ मार्गों पर पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था का अभाव जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में इस अवधि के दौरान यातायात प्रबंधन, स्ट्रीट लाइट, सड़क संकेत और गति नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
सड़क किनारे पार्किंग भी बढ़ा रही जोखिम
सड़क सुरक्षा को लेकर राज्य के परिवहन मंत्री दीपक बिरुवा ने जिलों के उपायुक्तों, जिला परिवहन पदाधिकारियों (डीटीओ) और मोटर वाहन निरीक्षकों (एमवीआई) के साथ आम लोगों से भी मुख्य और सहायक सड़कों पर वाहन पार्क नहीं करने की अपील की है।
मंत्री के अनुसार, सड़क पर वाहन खड़े रहने से आवागमन बाधित होता है और दुर्घटना की आशंका बढ़ती है। उन्होंने गैराज, वाशिंग सेंटरों और युवाओं से भी नियमों का पालन करने को कहा है। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
सड़क किनारे खड़े वाहन विशेषकर रात के समय चलती गाड़ियों के लिए अचानक अवरोध बन सकते हैं। बिना पर्याप्त प्रकाश या चेतावनी संकेत के खड़े वाहन गंभीर हादसे का कारण बन सकते हैं। इसलिए अनधिकृत पार्किंग पर प्रभावी नियंत्रण दुर्घटनाओं की रोकथाम की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
दुर्घटना के बाद का पहला घंटा भी निर्णायक
सड़क सुरक्षा का अर्थ केवल दुर्घटनाओं को रोकना नहीं, बल्कि हादसे के बाद घायलों को समय पर उपचार उपलब्ध कराना भी है। गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने में देरी उसकी स्थिति को और गंभीर बना सकती है।
ब्लैक स्पॉट और दुर्घटना संभावित क्षेत्रों के आसपास एंबुलेंस की उपलब्धता, प्राथमिक उपचार की व्यवस्था और अस्पतालों में ट्रॉमा केयर सुविधाओं को मजबूत करना जरूरी है। पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और आपातकालीन सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय से दुर्घटना के बाद प्रतिक्रिया समय कम किया जा सकता है।
सिर्फ चालान से नहीं बदलेगी तस्वीर
हेलमेट और सीट बेल्ट की जांच, चालान तथा नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, लेकिन केवल प्रवर्तन के भरोसे सड़क दुर्घटनाओं को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। सड़क की डिजाइन, ब्लैक स्पॉट, गति सीमा, पैदल यात्रियों की सुरक्षा, भारी वाहनों की निगरानी और आपात चिकित्सा व्यवस्था पर एक साथ काम करना होगा।
राज्य में एकीकृत सड़क दुर्घटना डेटाबेस यानी आईआरएडी जैसी व्यवस्था भी उपलब्ध है। दुर्घटनाओं के आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर यह पता लगाया जा सकता है कि किन स्थानों पर किस तरह के हादसे अधिक हो रहे हैं और वहां किस प्रकार के सुधार की जरूरत है।
सड़क सुरक्षा सामूहिक जिम्मेदारी
झारखंड में सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े ऐसी चुनौती की ओर इशारा करते हैं, जिसका समाधान किसी एक विभाग के स्तर पर संभव नहीं है। पुलिस को यातायात नियमों का पालन सुनिश्चित करना होगा, परिवहन विभाग को वाहनों और चालकों की निगरानी मजबूत करनी होगी, सड़क निर्माण एजेंसियों को सुरक्षित डिजाइन और ब्लैक स्पॉट सुधार पर ध्यान देना होगा तथा स्वास्थ्य विभाग को दुर्घटना के बाद त्वरित उपचार की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
साथ ही वाहन चालकों और आम नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। तेज रफ्तार से बचना, हेलमेट और सीट बेल्ट का अनिवार्य उपयोग करना, नशे में वाहन नहीं चलाना और सड़क पर अनधिकृत पार्किंग नहीं करना ऐसे कदम हैं, जो व्यक्तिगत स्तर पर उठाए जा सकते हैं।
2026 के पहले छह महीनों में 2,478 मौतें और पिछले वर्षों में लगातार हजारों मौतों का आंकड़ा गंभीर चेतावनी है। 2025 और 2026 के आंकड़े अंतरिम होने के बावजूद तस्वीर चिंताजनक है। सड़क को सुरक्षित बनाने के लिए अब केवल दुर्घटना के बाद कार्रवाई नहीं, बल्कि दुर्घटना से पहले जोखिम की पहचान और उसे दूर करने की रणनीति को प्राथमिकता देनी होगी। तभी झारखंड की सड़कें विकास की राह बनेंगी, मौत की नहीं।
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हिन्दुस्थान समाचार / विकाश कुमार पांडे

